June 18, 2021

शक्ति न्यूज अल्मोड़ा |

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अल्मोड़ा पुलिस का सराहनीय प्रयास – मिशन हौसला के अन्तर्गत पुलिस विभाग द्वारा रक्तदान

खण्ड खण्ड होता आ रहा है अल्मोड़ा

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-कैलाश पाण्डे…..
चंद राजाओं ने अल्मोड़ा नगरी को अपनी राजधानी बनाया और लगभग 255 साल तक कुमांऊ का शासन अल्मोड़ा से किया। अल्मोड़ा जो कभी चंद राजाओं के समय पूरे कुमांउ की राजधानी थी और जिसे कुमांऊ की सांस्कृतिक और आध्यामित्क नगरी के रूप में दर्जा प्राप्त था वह अब कुमांऊ मंडल से ही बाहर होने जा रहा है।
चद राजाओं के समय अल्मोड़ा सम्पूर्ण प्रशासनिक मुख्यालय रहा जिसमें गढ़वाल भी शामिल था और अब धीरे धीरे क्षेत्रा और प्रशासनिक इकाई के रूप में सिमटती ही जा रहा है। 1560 से लेकर 1815 तक यहां चद और गोरखो का शासन था और 1815 में अंग्रेजो ने उत्तराखंड का शासन ले लिया और उन्होंने उत्तराखंड को दो भाग किये ब्रिटिश गढ़वाल व टिहरी गढ़वाल। ब्रिटिश गढ़वाल को कुमांऊ प्रोविंस कहा जाता था तथा कुमांऊ प्रोविंस के लिए 1837 में कमिश्नर की नियुक्ति की गयी और अल्मोड़ा कमिश्नरी मुख्यालय बना। अंग्रेजों ने कुमांऊ व गढ़वाल का शासन (टिहरी गढ़वाल रियासत को छोड़कर) अल्मोड़ा से ही चलाया। वर्ष 1839 में कुमांऊ प्रोविंस के दो जिलें बनाये गये अल्मोड़ा और ब्रिटिश गढ़वाल तथा 1889-90 में अल्मोड़ा को काटकर नैनीताल जिला बना तब कुमांऊ में डीएम के बदले सीनियर अस्सिटें कमिशनर यहां हुआ करता था। अंग्रेेज अपफसर अधिक समय तक नैनीताल में ही बैठते थे और नैनीताल में तभी कमिश्नरी बनी और तभी से अल्मोड़ा में कमिश्नरी के स्थान पर जिला मजिस्ट्रेट तैनात हुवे। अल्मोड़ा में 1894 में पहले अंग्रेज आईसीएस अफसर जे बी स्टूअर्ट बतौर जिला मजिस्ट्रेट के अल्मोडा में तैनात हुवे। आजादी के बाद भी कुमांऊ में 1960 तक अल्मोड़ा और नैनीताल दो ही जिले थे फिर फरवरी 1960 में अल्मोड़ा से काटकर पिथौरागढ़ जिले का गठन हुआ तथा गढ़वाल में भी चमोली और उत्तरकाशी दो जिले बने। लेकिन गढ़वाल के दोनो जिले कुमांऊ कमिश्नरी के अंतर्गत रहे क्योकि तब कुमांऊ ही एक मात्रा कमिश्नरी थी जिसमें की गढ़वाल मंडल भी शामिल था। वर्ष 1967 में एक लंबे आंदोलन के बाद गढ़वाल को कमिशनरी का दर्जा मिला और फिर देहरादून को गढ़वाल कमिश्नरी में शामिल किया गया इससे पहले देहरादून मरेठ कमिश्नरी में आता था। 1995 में नैनीताल को विभजित कर उधम सिंह नगर बना तथा 1997 में अल्मोड़ा से काटकर बागेश्वर तथा पिथौरागढ़ से काटकर चंपावत जिला 16 सिंतबर 1997 को बना। इसी प्रकार गढ़वाल मंडल में चमोली से काटकर रूद्रप्रयाग जिला बना। उत्तराखंड राज्य का गठन 09 नंवबर 2000 को हुआ तब देहरादून को अस्थायी राजधानी का दर्जा दिया गया था और गढ़वाल एवं कुमांऊ दो मंडल थे। कुमांऊ मंडल में अल्मोड़ा, चंपावत, पिथौरागढ़, बागेश्वर, नैनीताल, उधम सिंह नगर शामिल थे तथा गढ़वाल मंडल में उत्तरकाशी, चमोली, रूद्रप्रयाग, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी, देहरादून, हरिद्वार जिले सम्मालित है।
गढ़वाल में उत्तरकाशी जनपद के अंतर्गत भटवाड़ी, डुण्डा, चिन्यालीसौड, बड़कोट, पुरोला, मोरी, जोशियाड़ा, धौतरी, बर्नीगाड, सांकरी चमोली जनपद के अंतर्गत जोशीमठ, कर्णप्रयाग, गैरसैंण, थराली, चमोली, पोखरी, घाट, आदिब्रदी, (चांदपुरगढ़ी), जिलासू, नारायणबगड़, नन्दप्रयाग, देवाल, टिहरी गढ़वाल में प्रतापनगर, घनसाली, देवप्रयाग, जाखणीधर, नरेंद्रनगर, धनौल्टी, कंडीसौड़, गाज, नैनबाग, कीर्तिनगर, बाल गंगा, पावकी देवी, मदन नेगी। देहरादून जनपद के अतर्गत देहरादून, विकासनगर, कालसी, चकराता, ऋषिकेश, त्यूनी, डोईवाला। पौड़ी गढ़वाल में पौड़ी कोटद्वार श्रीनगर, लैंसडाउन, धुमाकोट, थलीसैंण, यमकेश्वर, चैबट्टाखाल, सतपुली, चाकीसैण, जाखणीखाल, बीरोखाल, रिखणीखाल है। रूद्रप्रयाग जनपद के अंतर्गत रूद्रप्रयाग, उखीमठ, जखोली, बसुकेदार है। हरिद्वार जनपद में हरिद्वार, रूड़की, लक्सर, भगवानपुर, नारसन, लालढांग तहसील है। इसके साथ ही कुमांऊ मंडल में अल्मोड़ा में अल्मोडा, जैंती, भनौली, सोमेश्वर, रानीखेत, द्वाराहाट, चौखुटिया, सल्ट, भिकियासैंण, स्याल्दे, धौलछीना को तहसील का दर्जा देने के साथ ही कुछ स्थानों पर उप तहसील भी बनायी गयी है। ऊधम सिंह नगर में जसपुर, काशीपुर, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, सितारंगज, खटीमा नानकमत्ता। चंपावत में चंपावत, लोहाघाट, पाटी, बाराकोट, मंच, पुल्ला। नैनीताल में नैनीताल, हल्द्वानी, रामनगर, लालकुआं, धारी, कोश्यांकुटौली, कालाढूंगी, बेतालघाट, रामगढ। पिथौरागढ़ में पिथौरागढ़, गंगोलीहाट, बेरीनाग, डीडीहाट, मुनस्यारी, धरचूला, कनालीछीना, देवलथल, बंगापानी, गणाई गंगोली, थल, तेजम, पाखू है। बागेश्वर में बागेश्वर, गरूड, कपकोट, कांडा, कापफीलीगैर, दुगनाकुरी, शामा ;उपद्ध तहसीले है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा गैरसैंण में 04 मार्च को चुनावी वर्ष का अपना अंतिम बजट प्रस्तुत करने के बाद गैरसैंण को कमिशनरी बनाने की घोषणा कर दी और इस कमिशनरी में गढ़वाल मंडल के दो जिले रूद्रप्रयाग व चमोली तथा कुमांऊ मंडल के दो जिले अल्मोड़ा और बागेश्वर को सम्मिालित किये जाने तथा गैरसैंण में ही मंडल स्तरीय कार्यालय खोलने की घोषणा की। मुख्यमत्री की इस घोषणा के बाद अल्मोड़ा जनपद जो कि कभी कुमांऊ की सांस्कृतिक और आध्यत्मिक नगरी कहलाती थी और जो कभी कुमांऊ और गढ़वाल मंडल का प्रशासनिक मुख्यालय रहा वह अब टुकरों में बंट कर रह गया है। पहले अल्मोड़ा के अंतर्गत ही टिहरी रियासत को छोड़कर गढ़वाल सहित एक ही मंडल था और अब अल्मोड़ा के टुकडे कर जहां दो कमिश्नरियां और 13 जिले बन गये वहीं अब अल्मोड़े का अस्तित्व ही गैरसैंण कमीश्नरी में मिलने के बाद समाप्त होने के कगार पर है। क्योंकि जो जिला पहले कुमांऊ मंडल के अंतर्गत था अब वह कुमाऊ मंडल से बाहर गैरसैंण कमिश्नरी में मिलने जा रहा है तथा ब्रिटिश काल में जो इसकी पहचान बनी थी वह अब टुकडों में बटकर शनेः-शनेः समाप्त हो रही है।
मुख्यमंत्री द्वारा गैरसैंण कमिश्नरी बनाये जाने की घोषणा का जहां कांग्रेस ने तीव्र विरोध किया वहीं अल्मोड़ा और बागेश्वर जनपद से चुने गये भाजपा के विधायक व सांसद चुप रहे और उन्होने मुख्यमंत्री के आगे नतमस्तक होकर उनकी इस औचोत्यिहीन घोषणा का स्वागत ही किया। इससे यह लगता है इन दोनो जिलों के भाजपा के विधायक ही नहीं वरन भाजपा के जिलाध्यक्ष सहित संगठनों के लोगों की सहमति भी इसमें दिखती है क्योंकि उनकी यह चुप्पी इस बात को इंगित करती है कि वे मुख्यमंत्री के हर सही और गलत निर्णय के साथ हैं। यदि मुख्यमंत्री को गैरसैंण का विकास करना ही था तो पहले गैरसैंण को जिला घोषित करते और उसे जिला मुख्यालय बनाते। एक ओर तो प्रदेश के मुख्यमंत्री यह कहते नहीं थकते कि एक जिले के निर्माण में अत्याधिक व्यय आाता है उससे कहीं अधिक व्यय कमिश्नरी के निर्माण में आयेगा और बिना जिला मुख्यालय के कमिश्नरी का मुख्यालय होना कितनी औचित्य पूर्ण होगा यह आने वाला समय ही बतायेगा। यद्यपि अल्मोड़ा और बागेश्वर जनपद के लोगों द्वारा गैरसैंण कमिशनरी में मिलाये जाने का विरोध् धीरे धीरे प्रारंभ होते जा रहा है और प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा भाजपा सरकार के विरूद्व धरना प्रदर्शन कर विरोध दर्ज किया जा रहा है। गैरसैंण में अल्मोड़ा जनपद को नये मंडल में मिलाये जाने को लेकर स्थानीय जनता में रोष उत्पन्न होना स्वाभाविक है क्योंकि त्रिवेंद्र सरकार द्वारा लिये जा रहे इस प्रकार के जनविरोधी फैसलों से आने वाले 2022 के चुनावों में भाजपा सरकार को इसका खामियाजा भुकतना पड़ सकता है क्योंकि बिना जनता और जन नेताओं की राय लिये ही इस प्रकार के फैसले लेना कहां तक न्यायोचित होगे कहा नहीं जा सकता। यह सब भविष्य के गर्त में छिपा है। कांग्रेस ने तो इसका विरोध प्रारंभ कर दिया है और उसका मानना है कि पहले नये जिले का गठन कर छोटी इकाईयां विकसित की जानी थी ताकि उस क्षेत्रा का समुचित विकास हो सके और तब जाकर नये मंडल का गठन किया जाना चाहिए था जो कि नहीं किया गया।

अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉक्टर आर जी नौटियाल का संदेश

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