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10 सितम्बर को 132वीं वर्ष गांठ पर विशेष यह भी जाने— कुछ अनछुवे पहलू पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के

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पण्डित गोविंद बल्लभ पंत का जीवन त्याग बलिदान और आत्मोसर्ग का जीवन रहा है। सक्रिय राज​नीतिकज्ञ होने के कारण वह स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले उस समय के संयुक्त प्रान्त के मुख्यमंत्री रहे और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वह उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री रहे। उसके बाद वह केन्द्रीय गृहमंत्री रहे और अपने अन्तिम सांस तक उस पद में रहे राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्रों में पण्डित गोविंद बल्लभ पंत की महान उपलब्धियों से सभी परिचित है लेकिन यह बहुत कम लोग जानते है कि अपने व्यक्तिगत जीवन चरित्र व मानवीय गुणों में वह कहीं अधिक महान थे पंत जी के परिवारिक जीवन पर कुछ उल्लेख करना आज समीचीन होगा।
1909 में पंत जी के पहले पुत्र की थोड़े दिन की बिमारी के पश्चात् मृत्यु हो गयी। उनकी पत्नी गंगा देवी पुत्र को जन्म देने के बाद से ही रोगी रहने लगी थी। पुत्र की मृत्यु के बाद कुछ दिनों पश्चात् वह भी उन्हें सदैव छोड़कर चल दी। इस समय पंत जी की आयु मुश्किल से 23 वर्ष की थी। गंगा देवी से पंत जी का विवाह 1899 में केवल 11—12 वर्ष की आयु में हो गया था।
वृद्ध माता—पिता की इच्छा तथा घर वालों के दबाव के कारण 1912 में पंत जी का दूसरा विवाह अल्मोड़ा में ही हुआ इसी वर्ष वे अपनी पत्नी को लेकर काशीपुर चले गये। 1914 में उनकी दूसरी पत्नी का भी निधन हो गया तथा 1916 में काशीपुर के तारादत्त पाण्डे की पुत्री कला देवी के साथ उनका तीसरा विवाह हुआ।
10 सितम्बर को भारतरत्न प0 गोविंद बल्लभ पंत की 132 वां जन्म दिवस है। पंत जी आजीवन शक्ति पत्र के संरक्षक रहे पण्डित पंत के अनेक संस्मरण शक्ति में प्रकाशित हो चुके है इन्हीं में से एक रोचक संस्मरण शक्ति के 26 नवम्बर 1932 के अकं में इस प्रकार प्रकाशित हुआ है।:— जब पंत जी ने टम्टा नौला में पानी पिया
”पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के निश्चयानुसार अगले दिन उनके नेतृत्व में लगभग सौ सवर्णों की एक टोली जिसमें प्रतिष्ठित घरो के ब्राहम्ण क्षत्रिय, वैश्य सभी थे टम्टा नौले (बावड़ी) को चली शिल्पकार (हरिजन) नेता भी साथ थे सबने वहां पहुंच कर नौले में जल पिया। श्री हरिटम्टा ने पंत जी को इस उदार कार्य के लिए धन्यवाद दिया। श्री खुशी राम जी गदगद हो गये उन्होंने हाथ जोड़कर कहा आज मेरा भ्रम और अविश्वास दूर हो गया आज तक मेरा आप लोगों से जो असहयोग था वह भी दूर हो गया। उत्तर में पंत जी ने एक छोटा किन्तु मर्म स्पर्शी भाषण दिया। उन्होंने कहा अब शिल्पकारों की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है उन्हें सफाई और स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए ताकि उनके बीच में कार्य करने वाले ​द्विजों को शिकायत का मौका न रहे। इसके कुछ दिनों पश्चात् ही अल्मोड़े का प्रसिद्ध मुरली मनोहर मंदिर हरिजनों के लिये खोल दिया गया।

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