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शक्ति के पन्नों से—प्रथम गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने पद ग्रहण के बाद दिया गया प्रथम संदेश

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प्रथम गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने पद ग्रहण के बाद राष्ट्र के नाम रेडियो से जो अपना प्रथम संदेश दिया वह इस प्रकार है:—
धन्य है वह सर्व शक्तिमान परमात्मा जिसने यह शुभ् दिन इस प्राचीन देश को दिखलाया। धन्य है महात्मा गांधी जिसकी तपस्या और अमोघ सत्याग्रह ने जो अनहोनी बात मालूम होती थी उसे कर दिखलाया। और धन्य है वह नर नारियां जिन्होंने अपने श्रम और त्याग से अपनी मेहनत और कुर्बानियों से देश को इस योग्य बनाया कि आज हम यहां लोकतंत्रात्मक गणराज्य स्थापित कर रहे है। जमूहरी सल्तनत कायम कर रहे है। इतिहास में यह पहला अवसर है जब यह सारा देश क​​श्मीर से कन्या कुमारी तक और काठियाबाद और कच्छ कोकानाढा और कामरूप तक एक संविधान के शासन सूत्र में बंध कर 32 करोड़ मनुष्यों के सुख दुख की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले रहा है। और उसके सब कारोबार सभालने जा रहा है। इस देश में आज से न कोई राजा रहा और न कोई प्रजा। या तो सब के सब राजा है या प्रजा। यह देश धन्य धान्य से परिपूर्ण है। अब हमकों पूरा मौका मिला है जब यहां के 32 करोड़ रहने वालों को हम सुखी बना सकते है और संसार में शांति की स्थापना और भ्रातभावना के प्रचार में मददगार हो सकती हैं। हमारे गणराज्य का उद्देश्य है कि हम न्याय, स्वाधीनता और क्षमता और भ्रातभाव का देश में प्रचार करेंगें जहां भिन्न भिन्न धर्मों के मानने वाले भिन्न भिन्न भाषाओं के बोलने वाले भिन्न भिन्न आचार व्यवहार के बरतने वाले बसते है। सभी दूसरों देशों के साथ मै​त्री रखते हुवे अपने देश की सर्वतोमुखी और सर्वांगीण उन्नति हमारा लक्ष्य है। आज गरीब, बिमारी, अशि​क्षा और अज्ञान को हटाना हमारा कार्यक्रम है। लाखों भाई और बहन निर्वासित होने के कारण बहुत मुसीबत उठा चुके है और आज भी झेल रहे है। उनके दुख से दुखी होकर उनको दूर करने का यथासाध्य प्रत्यन करना हमारा कर्तत्व हैं। जो पिछडे हुवे लोग है उनकी उन्नति के लिए विशेष प्रंबंध करना हमारा फर्ज है। इनकी सबकी पूर्ति के लिए स्वतंत्रता की स्थापना भी अनिवार्य रूप से देश और काल का तकाजा है। मेरी आशा और प्रार्थना है कि जो सुअवसर हमें प्राप्त हुआ है उसका हम सदउपयोग करेंगे। आजादी के शुरू के दिनों तप त्याग और सच्ची सेवा की पहले से भी ज्यादा जरूरत है और हमारी आशा और विश्वास है कि इस देश के सभी रहने वाले इसके प्रति कर्तत्व का पालन करेंगें। हमकों चाहिए इस शुभ दिन का स्वागत करते हुवे अपने फर्जो को समझे। उन उदेश्यों की पूर्ति में जिसके लिए राष्ट्रपिता जिये और मरे दृढ़ संकल्प हो जाये और इस महान कार्य के सामने छोटे छोटे व क्षुद्र स्वार्थो का त्याग करें।

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