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गोवर्धन पूजा…

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कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। इस पर्व पर गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का चित्र बनाकर गोवर्धन भगवान की पूजा की जाती है। गोवर्धन पूजा से संबंधित एक प्राचीन कथा प्रचलित है कि एक बार भगवान कृष्ण ने गोकुल वासियों से इंद्र देव की पूजा करने के बजाय गोवर्धन की पूजा करने को कहा इससे पूर्व गोकुल के लोग इंद्रदेव को अपना ईष्ट मानकर उसकी पूजा करते थे। भगवान कृष्ण के गोकुल वासियों से कहा कि गोवर्धन पर्वत के कारण ही उनके पशुओं को खाने के लिए चारा मिलता है गोवर्धन के कारण ही गोकुल में वर्षा होती है। इसलिए इंद्रदेव की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा अर्चना की जानी चाहिए। जब इंद्र को कृष्ण की इस बात के बारे में पता चला तो उन्हें बड़ा क्रोध आया और ब्रज में तेज मूसलाधार वर्षा कर दी। तब भगवान कृष्ण ने ब्रज के लोगों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचा लिया था गोवर्धन का अर्थ भी है कि गो वर्धन अर्थात गोवंश का वर्धन करना। गोवर्धन पूजा को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता है। अन्नकूट का अर्थ है भोजन का पर्वत भगवान श्री कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रज वासियों की इंद्र के प्रकोप से रक्षा करने पर गोवर्धन वासियों ने श्री कृष्ण यानी गोवर्धन जी को छप्पन भोग परोसने की मान्यता है अन्नकूट महोत्सव पर नए अनाज का भोग लगता है। इस दिन भगवान के निमित्त छप्पन भोग बनाया जाता है। कहते हैं कि अन्नकूट महोत्सव मनाने से मनुष्य को लंबी आयु तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है अन्नकूट महोत्सव इसलिए मनाया जाता है कि इस दिन नए अनाज की शुरुआत भगवान को भोग लगाकर ही की जाती है। गोवंशीय पशुओं को स्नान करा कर धूप आरती तथा फूल माला पहना कर उनकी पूजा की जाती है। मथुरा में कैसे आया गोवर्धन पर्वत, जानिए वह प्रसंग—मथुरा में स्थित गोवर्धन पर्वत और इसके आसपास के क्षेत्र को लोग ब्रज भूमि भी कहते हैं। कहते हैं कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में ब्रज वासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाया था। मथुरा के गोवर्धन पर्वत के बारे में अधिकांश लोग जानते हैं। इस पर्वत की परिक्रमा का बेहद खास धार्मिक महत्व माना जाता है। इसलिए इसकी परिक्रमा करने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। मथुरा में गोवर्धन पर्वत कैसे आया? इसको आज भी शायद कम लोग ही जानते हैं।

प्रसंग के माध्यम से जानते हैं कि मथुरा में गोवर्धन पर्वत कैसे आया। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार लगभग पांच हजार साल पहले गोवर्धन पर्वत तीस हजार फीट ऊंचा हुआ करता था। लेकिन आज यह पर्वत मात्र तीस मीटर का ही रह गया है। बेहद पुराने इस गिरिराज पर्वत के बारे में ऐसी मान्यता है कि इस पर्वत की खूबसूरती से पुलस्त्य ऋषि बहुत प्रभावित हुए। उनहोंने द्रोणांचल पर्वत से इसे उठाकर साथ लाना चाहा। तब गिरिराज जी ने पुलस्त्य ऋषि से कहा कि आप मुझे जहां भी पहली बार रखेंगे मैं वहीं पर स्थापित हो जाऊंगा। कहते हैं कि इस पर्वत को लाते वक्त रास्ते में साधना के लिए ऋषि ने इस पर्वत को नीचे रख दिया। फिर वह दुबारा इस पर्वत को हिला भी नहीं सके। इससे क्रोध में आकर उन्होंन पर्वत को ये श्राप दे दिया कि वह रोज घटता जाएगा। माना जाता है कि उसी समय से गोवर्धन पर्वत का आकार लगातार घटता जा रहा है।

जगदीश जोशी

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