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मानव वन्यजीव संघर्ष को जैव संसाधन संरक्षण के द्वारा कम करने की आवश्यकता— प्रोफेसर सुकुमार

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गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान, कोसी—कटारमल, का स्थापना दिवस गोविन्द बल्लभ पंत की 132 वीं जन्म दिवस पर भारतीय विज्ञान संस्थान बंगलुरु, के प्रो0 रमन सुकुमार द्वारा 25वां गोविन्द बल्लभ पंत स्मारक व्याख्यान देते हुए उन्होंने मानव—वन्यजीव संघर्षो के बीच दोराहे पर संरक्षण विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए बताया कि मानव—वन्यजीव संघर्ष के लिए जिम्मेदार कारक वन विखण्डन की भूमिका को हाथी—मानव संघर्ष के उदाहरण के साथ रेखांकित करते हुए कहा कि विकास से जुड़ी गतिविधियों के कारण प्राकृतिक वनों में हो रहे लगातार विखण्डन से वन्य जीवों के लिए प्राकृतिक खाद्य संसाधनों की कमी हो रही है। उन्होंने कहा कि राज्यों में वन भूमि, खनिजों के लिए खनन या ईधन, चारा और खपत के लिए बायोमास के संग्रह की वजह से जानवरों के लिए चारा एवं उनके विचरण स्थल पर गहरा संकट गहराता जा रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह वन्य जीव—मानव संघर्षों के प्रबंधन के लिए एक व्यापक नीतिगत ढांचा तैयार करने का समय है। लेकिन इसके लिए वित्तीय प्रोत्साहन की आवश्यकता है जो अब कैम्पा (क्षतिपूरक वनीकरण और प्र​बंधन योजना प्राधिकरण) के माध्यम से संभव है। हमारी बड़ी आबादी को देखते हुए हमें जैव विविधता संरक्षण और वन्य जीव संघर्ष को कम करने के व्यापक लक्ष्यों में, विशेष रुप से, जलवायु परिवर्तन की चल रही व्यवस्था के तहत लोगों को विशेष रुप से जमीनी स्तर पर सक्रिय रुप से संलग्न करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना में इनमें से कईयों को शामिल कर लिया गया है, लेकिन क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर संरक्षण योजना और कार्यान्वयन को सक्रिय रुप से अपनाने की आवश्यकता है।

संस्थान के निर्देशक डा0 आर0एस0 रावल ने कहा कि यह संस्थान देश के चुनिंदा संस्थानों में से एक है। उन्होंने कहा कि हिमालयी राज्यों के जो प्राकृतिक स्रोत है उनके संवर्धन और संरक्षण के लिए इस संस्थान को भारत सरकार ने जिम्मेदारी सौंपी है। जिसे संस्था पूर्ण कर रही है। उन्होंने कहा कि विगत 30 वर्षो से संस्थान ने शोध कार्यो की बदौलत राष्ट्रीय तथा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशेष पहचान बनायी है। संस्थान द्वारा समय समय पर विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से लोगों पर्यावरण संरक्षण एवं जीविकोपार्जन से जोड़ने का सफल प्रयास किया है तथा चीड़ के पिरुल इत्यादि से विभिन्न उत्पादों का निर्माण करने का प्रशिक्षण देकर लोगों को स्वावलम्बी बनाने में महत्वपूर्ण ​भूमिका निभाई है। इस अवसर पर प्रो0 एस0पी0 सिंह, भूतपूर्व कुलपति, हेमवती नन्दन बहुगुणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर, गढ़वाल, डा0 राजेन्द्र डोभाल, महानिदेशक, उत्तराखण्ड स्टेट काउंसिल साइंस एण्ड टैक्नोलॉजी, देहरादून डा0 गोपाल सिंह रावत, निदेशक, भारतीय वन्य—जीव संस्थान, देहरादून आदि ने संस्थान को उत्कृष्ट शोधकार्य हेतु संस्थान को बधाई दी। इस अवसर पर संसद अजय टम्टा, वैज्ञानिकों से जल संरक्षण और यहां से पलायन रोकने तथा हिमालय क्षेत्र की प्रमुख कठिनाईयों की ओर वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान को सफल बनाने की अपील करते हुए कहा कि उन्होने इस बात की प्रशंसा कि की संस्थान द्वारा सामाजिक वैज्ञानिक जिम्मेदारी समझ कर प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।

इस अवसर पर संस्थान के सभी वैज्ञानिक शोधार्थी एवं कर्मचारी मौजूद थे संचालन डा0 दीपा बिष्ट द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ वैज्ञानिक ई किरीट कुमार द्वारा किया गया।

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