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नवरात्र में शक्ति पूजन की महत्ता एवं वर्तमान परिपेक्ष

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या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
मां दुर्गा की आराधना का पर्व है नवरात्र। शारदीय नवरात्र में नौ दिनों में मां शैलपुत्री, ब्रहमचारणी, चन्द्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, व सिद्धिदात्री स्वरुप का दर्शन पूजन किया जाता है। नौ शक्तियों के मिलन को ही नवरात्र कहा जाता है। जब आसुरी शक्तियों ने पृथ्वी पर हाहाकार मचा दिया। पृथ्वी लोक व देव लोक में भी आसुरी शक्तियों का आधिपत्य हो गया। तब देवराज इन्द्र त्रिमूर्ति भगवान के पास गये। ब्रहमा, विष्णु, शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनायी और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली और उस आकृति को एक बालिका का रुप दिया। इसलिए आज भी मां के उस रुप को शक्ति ही कहा जाता है। क्योंकि सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें शक्ति प्रदान की इसलिए वह सबसे शक्ति शाली मानी गई। सभी देवों ने उन्हें अपने—अपने अस्त्र शस्त्र प्रदान किए तब पर्वत राज ने उन्हें सवारी हेतु सिंह प्रदान किया। तब देवताओं ने महिषासुर जैसे आसुरी शक्ति का वध करने उस देवी को भेजा। देवी को महिषासुर का वध करने में नौ दिन लगे। इस नौ दिनों में देवी ने अलग—अलग नौ रुप धारण किये।
आज के परिपेक्ष्य में देखें तो हमें शक्ति पूजन की महत्ता दूसरे अर्थो में भी जोड़ने की आवश्यकता है। समाज में आज हमारी शक्ति स्वरुपा माताएं बहनें भी प्रताड़ित हो रही है। उनके साथ अनेक तरह के व्यभिचार हो रहे है। इसलिए उन शक्ति स्वरुपा माता बहनों को भी संगठित होकर शक्तिशाली बनाना होगा। आज भी समाज में आसुरी शक्ति स्वरुप विधर्मी/अत्याचारी प्रचुर मात्रा में व्याप्त है। जो कहीं पर भी नारी शक्तियों का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं। उनसे अभद्र व्यवहार कर रहे हैं। आज की परिस्थिति में नारी शक्ति को शक्तिशाली बनना होगा ताकि वह अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों का प्रतिकार कर सके। देवी ने भी एक बालिका का ही रुप धारण कर अपनी शक्तियों को जाग्रत कर महिषासुर जैसे असुर का वध किया। हमें भी समाज में माताओं बहनों को शक्ति स्वरुपा बनाना होगा तभी हमारा शक्ति स्वरुपा देवी की अर्चना करना सार्थक होगा। — जगदीश जोशी

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