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जा हुंछी खेती बाड़ी वां आब धिरकण लागीं गुणी बानर

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इस बीच शक्ति की पुरानी फाइलें देखने पर एकाएक नजर शक्ति में छपे एक विज्ञापन में पडी जो कि एक तम्बाकू विक्रेता का था और उसमें यह लिखा था।
आलू आड़—स्यों नारिडगा
खूब करछियां पैदावार।
कां बेचनूं का खेडनू,
कैबेर छियां तब लाचार।
आब, जालै भेजनूं मौज हमरी।
म्वाल तिर अैगे मोटर कार।
धन—धन कांग्रेसी सरकार,
जां धिरकछिया गुणी वानर,
वां धिर कन लागी कार।
(उपयुक्त पंक्तियों में बताया गया है ​कि आजादी के बाद कांग्रेस सरकार आने से पहाड़ में इतनी प्रगति की है कि घर तक मोटर—कार आ गई है। पहले आलू, आडू, सेब और नारिड की खूब पैदावार होती थी लेकिन उसे उठाने वाला कोई नहीं होता। यह कांग्रेस सरकार की महिमा है कि घर तक मोटर कार आ गई है। जिससे यह पैदावार बेच कर हमारी मौज है। जहां पहले बंदर और लंगूर दोड़ते रहते थे वहां अब कारें दौड़ने लगी है।)
पृथक उत्तराखाण्ड राज्य बनने के 19 साल बाद भी पहाड़ की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए अभी तक प्रभावी नीति नहीं बन पाई है। पहाड़ी उपज की बढ़ती मांग और इन उपजों की पौष्टिकता को वैज्ञानिकों द्वारा मुहर लगाये जाने के बाद भी देशी—विदेशी बाजार में इनकी मांग निरंतर बढ़ती जा रही है। मडुवा (रागी) के विषय में तो वैज्ञानिकों ने अपने शेध करके इसका महत्व बताया है उसी तरह गहत की दाल, गडेरी आदि पर भी वैज्ञानिकों ने कई बार शोधकर इनके गुणों को दर्शाया है कुछ वर्ष पूर्व काफल की गुणवत्ता और इसकी पौष्टिकता की खूब चर्चा रही। आलू, आडू, माल्टा, पहाड़ी सब्जियों को नया बाजार मिलेगा जिससे पहाड़ की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। ऐसा समझा जाता था।
व्यवहार में ठीक इसके विपरीत (उल्टा) हुआ है। गांवों में बंदर, जंगली सुअर, भालू व जंगली जानवर इतने बढ़ गये है कि गांवों की अर्थव्यवस्था तार—तार हो गयी है। यह सब कुछ उस नवश्रृजित राज्य में हो रहा है जिसके बनते ही श्रेय लेने वालों की कमी नहीं रही उत्तराखण्ड बनने के बाद भी नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण भूमि बाहरी व्यक्तियों के हाथों जाने से नहीं रोक पाये।
निसंदेह विगत 40—50 सालों में पहाड़ों में सड़के काफी बनी है जिससे अपराध, शराब, वन माफिया, खनिज माफिया, खूब पनपा है। इसके विपरीत हरगांव तक कुकिंग गैस अभी नहीं पहुंच सकी है। जंगली जानवरों का आतंक और बढ़ते पलायन से न केवल गांव खाली हो रहे है अपितु खेत भी बजंर होते जा रहे है। इतना अवश्य हुआ है कि जीपों और टैक्सियों से सैकड़ो लोगों को रोजगार मिला है। वन अधिनियम 1980 और पर्यावरण ने परेशानियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है अब विकास प्राधिकरण लागू होने से हालत और भी बदत्तर हो चुकी है।
इन अधिनियमों से उपजे खतरों से अपने भयावह भविष्य की कल्पना करके निराशा के गर्त में पर्वतवासी डूबा नजर आता है।
आज गांवों में लोगों ने परम्परागत खेती करनी छोड़ दी है पहले बाजार में पहाड़ी गडेरी, गेठी, भट्ट, गहत, उरद, मडुवा, मदिरा, भांगा, भंगीरा, के साथ ही पहाड़ी फल, माल्टा, नारंगी, नीबू, नाशपाती, आडू, सेब, आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाती थी अब यह सब लुप्त प्राय सी हो गई है। इसका कारण जानने पर ग्रामीण किसानों का कहना है कि वे वर्ष भर मेहनत करके इन चीजों का उत्पादन करते हैं और पलक झपकते ही बंदर व जंगली जानवर इन्हें साफ कर जाते है जिससे उन्होंने अब पारम्परिक खेती करना छोड़ दिया है तथा गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायान कर दिया है। क्योंकि सरकारें उनकी एक नहीं सुनती और जंगली जानवरों से होने वाले फसलों को जो नुकसान होता हैं उसका अब उत्पादन ही उन्होंने बंद कर दिया है। प्रस्तुति:— कैलाश पाण्डे

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