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जानिये :— शाह भैरव मन्दिर के बारे में

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अल्मोड़ा नगर में अलग – अलग स्थानों में भैरव मन्दिर हैं । इनमें से आठ भैरव जी के मंदिर अष्ट भैरव के रूप में जाने जाते हैं। इसी प्रकार शाह भैरव मन्दिर मिलन चौक के पास स्थित है। यह मन्दिर अष्ट भैरव मन्दिर में शामिल नहीं है। यह मन्दिर बाद में बना हुआ है लोगों की इस मंदिर में अपार श्रद्धा है।
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में जब कुमाऊँ में चन्दों की सत्ता लड़खड़ा रही थी उस समय महाकाली अंचल के बैतिड़ी नगर से एक अभिजात्य नेपाली क्षत्रिय परिवार पश्चिमी नेपाल की अनिश्चित राजनीतिक अवस्था के कारण एवं आजीविका की खोज में गोंडा एवं अल्मोड़ा आया। एक भाई श्री बम शाह गोंडा चले गये और दूसरे भाई श्री लक्ष्मण शाह उपनाम श्री गूजा शाह अल्मोड़ा आ गए। चन्दों के दरबार में महत्वपूर्ण स्थान पाकर स्थायी रूप से श्री गूजा शाह अल्मोड़ा में तल्ला राजमहल के पास ( वर्तमान रामजे इन्टर कालेज अल्मोड़ा ) गोयल बिल्डिंग में रहने लगे।
चन्द सत्ता की समाप्ति के बाद गोरखा काल में ये व्यापार की ओर झुके। उन दिनों नेपाल से शुद्ध घी आता था। व्यापार से उन्हें अच्छा लाभ हुआ।
1816 में सिगौली की सन्धि के अनुसार महाकाली नदी के इस पार का प्रदेश कुमाऊँ एवं गढ़वाल अंग्रेजों के अधीन हुए। मि. गार्डनर। के बाद मि. ट्रेल इस प्रदेश के कमिश्नर बने। मि. ट्रेल के समय श्री लक्ष्मण शाह ने यथेष्ट मान, प्रतिष्ठा एवं सम्पदा अर्जित कर ली थी। उनके एकमात्र पुत्र थे श्री मोती राम शाह। इनका व्यक्तित्व भव्य, बुद्धि पैनी, व्यवहार कुशलता अप्रतिम थी। इन्होंने अल्मोड़ा में अपने इष्टदेव श्री शाह भैरव की प्रतिष्ठा की। तब से यह मन्दिर ‘ शाह भैरव मन्दिर ‘ के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर के पास ही उन्होंने एक पानी का धारा बनवाया जो ‘ मोतिया धारा ‘ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। अब यह धारा नहीं दिखता है। वर्तमान में इस स्थान को ‘ मिलन चौक ‘ के नाम से जाना जाता है। पुरानी पीढ़ी इस स्थान को अभी भी मोतिया धारा के नाम से ही जानती है। इस प्रकार श्री मोती राम शाह जी ने श्री शाह भैरव जी के मंदिर की स्थापना कर नगर वासियों को उपासना का स्थल दिया।
प्रस्तुति — प्रकाश चन्द्र पन्त
सम्पादक — ‘अल्मोड़ा टाइम्स’
अल्मोड़ा

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