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जानिये उत्तराखण्ड की विभूति — बी0डी0 पाण्डे

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उत्तराखण्ड में कई विभूतियों ने जन्म लेकर राष्ट्रीय एवम् अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। उनमें से एक है पंजाब एवम् पं0 बंगाल के राज्यपाल रहे स्व0 भैरव दत्त पाण्डे का जन्म 17 मार्च 1917 को चम्पानौला अल्मोड़ा में चन्द्र दत्त पाण्डे के घर हुआ तथा अपने प्रयाग विश्वविद्यालय और केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत 1938 में भारतीय सिविल सेवा में प्रविष्ट हुए और वे इस सेवा में प्रवेश पाने वाले उत्तराखण्ड के प्रथम व्यक्ति थे। आपके बाद भैरव दत्त सनवाल भारतीय सिविल सेवा में प्रविष्ट हूए थे।
बिहार कैडर से अपनी सेवा प्रारम्भ करने के बाद वे देश के कई महत्व पूर्ण प्रशासनिक पदों पर रहे। 1965 में आज जीवन बीमा निगम के अध्यक्ष रहे दो वर्ष बाद पुन: केन्द्र सरकार की सेवा में आये। 2 नवम्बर 1972 में वे देश के काबीना सचिव बने और 31 मार्च 1977 में आप मंत्रिमण्डलीय सचिव पद से सेवा निवृत हुए। उनकी प्रशासनिक क्षमताओं का लोहा प्रशासनिक क्षेत्रा के अलावा राजनेता भी मानते थे यही उनकके व्यक्तित्व की खूबी थी।
1981 में आप रेलवे प्रशासनिक सुधार कमेटी के अध्यक्ष रहे। उसके बाद 1981 से 1983 तक पश्चिम बंगाल तथा 1983—84 में पंजाब के राज्यपाल के साथ ही चण्डीगढ़ के प्रशासक भी रहे। वर्ष 2000 में आपको पदमविभूषण की उपाधि से विभूषित किया गया।
अवकाश ग्रहण करने के उपरांत आपने पर्वतीय विकास की कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर विचार विमर्श किया तथा किस प्रकार पर्वतीय क्षेत्रों का सर्वागीण विकास हो सकता है। इस पर अपने विचार प्रगट किए।
2 अप्रैल 2009 को 92 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस ली। पाण्डे जी के व्यक्तित्व की खूबी यह थी कि अपने सक्रिय जीवन में वे अल्मोड़ा के किसी कार्यक्रम में आमन्त्रित होने पर हमेशा भागीदारी करते रहे तथा प्रोटोकाल के बाद भी वे किसी भी कार्यक्रम के आयोजको को यह आभास नहीं होने देते कि उनके प्रोटोकाल से कोई समस्या खड़ी हो।
उन्होंने कभी भी किसी राजनैतिक दल की सदस्यता नहीं ली किन्तु उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। वे अपनी भाषा और संस्कारों का सर्वदा आदर करते थे तथा अपने आत्मीयजनों से कुमाऊंनी में ही बात करते थे। उन्होंने उत्तराखण्ड सेवानिधि के माध्यम से पर्यावरण शिक्षा पर बल दिया।
अवकाश ग्रहण करने के उपरांत पहाड़ में ही रहने का उनका संदेश पहाड़वासियों के लिए बहुत कुछ कह गया है यदि कोई उनसे सीखे तो यहा की माटी को छोड़कर पहाड़ के लोग पलायन नहीं करते।

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