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जानिये:— अल्मोड़े के इष्ट देव भोलेनाथ

” भोलानाथ ” ‘पण्डित नित्यानन्द मिश्र जी की डायरी से ‘-
बहुत दिनों की बात है कूर्माचल का राजा बाज बहादुर चन्द ( 1638 -78 ) था जो बड़ा वीर, विवेकी, शूर था। बाज बहादुर चन्द के कार्य काल में अल्मोड़ा नगरी खूब फूली – फली पर राजा के कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ। राजा तथा राजमहिषी ने जागेश्वर के मृत्युन्जय में शिव की आराधना की। राजमहिषी ने हाथ में दीपक लेकर रात भर जागरण किया। रात्रि -जागरण, पार्थिव – पूजा , रुद्राभिषेक सफल हुआ। राजा को उत्तराधिकारी मिला नाम था उद्योत चन्द ( 1678 – 98 )।’ कल्याणचन्द्रोदय काव्य ‘ के सर्ग एक में श्लोक 49 इस प्रकार जो पूजा की गई उसका वर्णन इस प्रकार है –
शिवरात्रि: कुमारार्थे करे कृत्वा सुदीपकम् ।
सावरोधेन नीता या सा रात्रिर्विस्मृता किमु ।।
हाथ में दीपक लिए , कुमार के जन्म के लिए शिवरात्रि की वह जागरण की रात्रि क्या भुलाई जा सकती है ?
युवराज उद्योत के दो विवाह हुए। दोनों रानियों के एक – एक पुत्र हुआ। छोटी रानी का पुत्र था हारचन्द
( हरिचन्द ) ।कामदेव सा रूपवान पर प्रकृति का चंचल, राजमहल के विलासमय वातावरण ने मन बहका दिया।बड़ा अस्थिर, चंचल स्वेच्छाचारी हो गया। बड़ी रानी का पुत्र था ज्ञान चन्द ( 1698 – 1708 ) जो बहुत समझदार, गम्भीर, विवेकशील था। कल्याणचन्द्रोदय काव्य का यह श्लोक इस प्रकार है –
अस्यास्तां श्री कुमारौ द्वौ ज्ञानेन्दुर्ज्ञानसागर: ।
हारचन्द्र: कनिष्ठस्तु साक्षात्कामइवापर: ।।
बाज बहादुर चन्द को अपना छोटा पोता हरिचन्द फूटी आँखों नहीं सुहाता था। स्वेच्छाचारी, संयमहीन युवराज को कैसे राज्य का उत्तराधिकारी बनाया जाए ? राज्यसभा के सभी सदस्य उसके विरुद्ध थे। उन्हें गम्भीर, विवेकशील ज्ञानचन्द प्रिय था। युवराज उद्योत चन्द अपने छोटे लड़के हरिचन्द को बहुत चाहते थे। उसी को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे पर उसके पिता बाज बहादुर चन्द अपने बड़े पोते ज्ञानचन्द को उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। इसी कारण बाज बहादुर चन्द एवं उद्योत चन्द ( पिता- पुत्र ) में मन – मुटाव बढ़ गया। विरोध यहाँ तक बढ़ा कि गृहयुद्ध की नौबत आ गई। जिसका वर्णन कल्याणचन्द्रोदय में इस प्रकार है –
पितामहप्रियतमो ज्येष्ठ: श्रीमानजायत ।
प्राणातत्प्रियतरो जात: कनिष्ठस्तु पितुर्महान् ।।
अथ दुर्दैवतोSमर्षात्तयो: र्नृपकुमारयो: ।
व्यवर्धत विरोधाग्नि र्लोकसंहारकारक: ।।
यह लोक संहारक विरोधाग्नि बढ़ती गई। प्रधानमंत्री ॠषिकेश जोशी तो निश्चेष्ट और अकर्मण्य हो गए थे। वे गुत्थी नहीं सुलझा सके तब बाज बहादुर चन्द ने अपने परामर्शदाता विश्वरूप पाण्डे जी को भीमताल से बुलाया। उनके समक्ष सारी स्थिति स्पष्ट कर दी। तब विश्वरूप पाण्डे जी ने राय दी कि गंगावली का प्रान्त अव्यवस्थित है।उसकी समुचित व्यवस्था करना राजा का कर्तव्य है। अत: महाराज कुमार उद्योत चन्द को गंगावली भेजा जाए, ताकि वहाँ सुव्यवस्था हो। उन्हीं के साथ कुमार हरिचन्द को भी वहाँ भेजा जाए। झगड़े की जड़ हरिचन्द राजधानी से दूर भेजे गए। उद्योत चन्द तथा हरिचन्द के राजधानी से हटने के कारण पारिवारिक कलह शान्त हो गया।कूर्माचल गृहयुद्ध से बच गया।
पितामह बाज बहादुर चन्द की अप्रसन्नता तथा राजसभा के प्रमुख सभासदों के विरोध ने राजकुमार हरिचन्द के भावुक हृदय पश्चाताप की आग भड़का दी। राजसी वैभव , सिंहासन की लिप्सा, सांसारिक मायाजाल को छोड़कर वे घर से निकल पड़े। कहाँ गये ? किधर गये ? किस स्थान पर योग साधना की ? कौन उनके गुरु रहे सब अज्ञात है। लगता है कि वे काली कुमाऊँ में काली नदी पार कर नेपाल प्रदेश चले गये और गुरु गोरखनाथ के सम्प्रदाय दीक्षित हो गए। दीक्षा के उपरान्त ‘ भोलानाथ ‘ नाम से प्रसिद्ध हुए।
नाथ सम्प्रदाय में दीक्षित होकर यह कुमार हरिचन्द भी अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त कर देशाटन करते हुए वर्षों बाद राजधानी अल्मोड़ा पहुँचे। आज इष्ट देव के रूप में घर- घर पूजित हैं। दु:ख में, सुख में लोग इन्हें याद करते हैं ।
अल्मोड़ा को इनका आशीर्वाद प्राप्त है। अल्मोड़ा में जहाँ पर इन्होंने अपनी धूनी रमायी वह स्थान आज सभी लोगों की श्रद्धा, विश्वास तथा आस्था का केंद्र है।
‘ इष्टदेव देव भोलानाथ सभी का भला करें।’
‘ जय भोलानाथ , जय इष्टदेव। ‘
प्रस्तुति— प्रकाश चन्द्र पन्त
सम्पादक— अल्मोड़ा टाइम्स
अल्मोड़ा

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