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जानिये:— अल्मोड़े की प्रसिद्ध बाल मिठाई

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अल्मोड़े की प्रसिद्ध बाल मिठाई कब बनी इसका इतिहास अभी तक इतिहासकारों ने नहीं बताया 1561ई0 में चन्दराजाओं की राजधानी अल्मोड़ा बनी तथा तब से राज परिवार यहां निवास करने लगा राज परिवार के आने के बाद उनके सेवकों में रसोईये के रुप मं बनारस से यहां भट्ट परिवार आया जो पाक शास्त्र में सिद्धहस्त था। इस परिवार के कुछ सदस्य जो सेवादारों के अतिरिक्त् थे ने जीविकोपार्जन के लिए यहां पकवान बनाकर बेचना प्रारम्भ किया। सम्भवत: यह इस शहर ​की प्रथम मिष्ठान की दुकान थी। जो स्थानीय रघुनाथ मन्दिर से लगभग 100 मीटर ऊपर की ओर जाते समय बाईं ओर संकरी गली के पास खुली। समझा जाता है। इसी बीच बाल मिठाई का आविष्कार हुआ परंतु इसका कोई प्रमाणित उल्लेख नहीं है। वर्तमान समय में बाल मिठाई जो कि अल्मोड़ा की मिठाई के नाम से जानी जाती है, उस बाल मिठाई का सुधरा हुआ रुप है। मूल बाल मिठाई के लिए खोये को काफी पकाकर उसे गर्म एक लकड़ी के पटरे (चौके) के ऊपर पिसी चीनी (बूरा) डालकर मिलाया जाता था। फिर उसे हाथों से ही बेलनाकार आकार दिया जाता और जब वह थोड़ा ठण्डा हो जाता, उसको चीनी की चाशनी में डुबाकर चीनी के दानों के ऊपर डाला जाता था। चीनी के दाने खसखस (पोस्त) के ऊपर चीनी चढ़ाकर पहले से ही तैयार कर लिये जाते थे। जिससे दाने बेलनाकर बाल मिठाई पर चिपक जायं। हाथों से बाल मिठाई को आकार देने की प्रक्रिया में खोये में विद्यमान घी, काफी मात्रा में निकल जाया करता था। जो कि कम प्रयोग में आता था पर उस समय से ही अल्मोड़ा की पहचान बन गयी बाल मिठाई।
मिठाई विक्रेता हीरा सिंह जीवन सिंह लाला बाजार अल्मोड़ा के मालिक नवनीत बिष्ट बताते है कि आज अल्मोड़ा में बाल मिठाई का जो स्वरुप सामने आया इसे सामने लाने का श्रेय स्वर्गीय नन्दलाल अग्रवाल को है और जिन्होंने खोये में विद्यमान अतिरिक्त घी, मिठाई में ही रहने दिया जिससे उसकी गुणवत्ता बनी रहती है। इसी तरह खोये को काफी पकाकर उसे एक बर्तन (ट्रे) में जमा दिया जाता है और ठण्डा होने पर उसे छोटे—छोटे टुकड़ों में काट दिया जाता है जिसे की चॉकलेट का नाम दिया गया है। इस प्रयोग को सर्वप्रथम स्वर्गीय हर लाल साह नन्दादेवी मार्ग पर स्थित मिठाई विक्रेता ने किया।

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