July 7, 2022

Shakti Almora

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जानियें:— मजा तब है जब आप कहे दूसरा समझे—डा0 हेमचन्द्र जोशी

हिन्दी भाषा साहित्यक के मर्मज्ञ स्वाधीनता सेनानी मानवता के आदर्श डा0 हेमचन्द्र जोशी का जन्म मल्लादन्या अल्मोड़ा निवासी चन्द्रबल्लभ जोशी के यहा हुआ 1906 में उन्होंने संस्कृत में प्रथम परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 1912 में रैमजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा से इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की इसी बीच साहित्यिक और सांस्कृतिक क्रियाकलापों में सहभागिता करते हुए अपने सम्पादकत्व में ”अरुणोदय” नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाली जिसमें सुमित्रा नन्दन पंत श्यामा चरण पंत गोविंद बल्लभ पंत इलाचन्द्र जोशी आदि की रचनाएं होती थी इसी पत्र के माध्यम से उक्त प्रतिष्ठित साहित्यिकारों का अपने बाल्यकाल में रचनात्मक प्रतिभा दिखाने का मंच मिला।
इण्टर के बाद 1915 में म्योर सेन्ट्रल कालेज इलाहाबाद से स्नातक करने के बाद 1917 में आपका विवाह हो गया 1917 से 1923 के मध्य स्वतंत्र लेखन एवम् संपादन में व्यस्त रहे। पराड़कर की गिरफ्तारी के बाद भारत मित्र के सहकारी सम्पादक रहे और उसके बाद कलकत्ता समाचार के प्रधान सम्पादक। 1922 में स्वामी सत्यदेव के आग्रह पर अल्मोड़ा लौट आए और कांग्रेस संगठन के कार्य में जुट गये 9 जनवरी 1922 को स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेेने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया।
1 गई 1923 को वे स्वामी सत्यदेव के साथ बम्बई से यूरोप के लिए रवाना हुवे दो वर्ष बाद 1925 में उन्होंने जर्मनी से एम0काम0 की उपाधि प्राप्त की इसी अवधि में वही भूत पूर्व राष्ट्रपति स्व0 डा0 जाकिर हुसैन से घनिष्टता हो गई वहा से पेरिस जाकर उन्होंने डा0 फूसे के निर्देशन पर सारबोन विश्वविद्यालय से ऋगवेद में वर्णित आर्थिक और राजनीतिक विचार पर डी0 लिट0 करने के उपरांत आस्ट्रिया जाकर 1 वर्ष तक भाषा विज्ञान के ध्वनि पक्ष का गहन अध्ययन करने के उपरांत 1929 में बहुभाषाविद के रुप में स्वदेश लौटे 1935 में उन्होंने कलकत्ता से ‘विश्ववाणी’ पत्रिका निकाली। उनकी विद्वता से प्रभावित गांधी जी ने उनसे अल्मोड़ा लौट कर स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग करने की आज्ञा दी। और 1942 में वे अल्मोड़ा आ गए विदेशी वस्तुओं की होली जलायी और ताड़ीखेत आकर कांग्रेस के संगठन कार्य में लग गए। देश के स्वाधीन होने के बाद बम्बई में रायल एशियाटिक सोसाइटी में भाषा विज्ञान के अध्ययन विश्लेषण में लग गए तथा 1949 में लखनऊ आकर भाषा परिषद की स्थापना की तथा 1951 में बम्बई में धर्म युग का सम्पादन किया। 1954 में नागरी प्रचारणी सभा काशी के आमंत्रण पर हिन्दी शब्द सागर के प्रधान संपादक बनकर बनारस चले गये।
डा0 जोशी प्रथम भारतीय विद्वान थे जिन्होंने यूरोप जाकर भाषा विज्ञान का सांगोपांग अध्ययन किया। संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, फारसी के ज्ञातव्य तो वे थे ही किंतु यूरोप प्रवास के दौरान उन्होंने जर्मन, लैटिन, ग्रीक, फैंच भाषा पर मास्टरी कर ली बंगाली, गुजराती नेपाली, उड़िया सिहली आदि भाषाओं के वे जानकार थे फ्रेंच भाषा में उन्होंने अपना डी0 लिट0 का शोध प्रस्तुत किया। सन् 1961—65 के मध्य उत्तरप्रदेश हिन्दी समिति लखनऊ के सहयोग से मैक्सक्यूलर कृत लेक्चर्रस आने द सांइस आफ लेग्वेज नामक ग्रथ के दोनों भागों का भाषा विज्ञान पर भाषण हिन्दी में अनुवाद किया था।
1961 से नैनीताल में स्थाई रुप से रहने लगे स्वाभिमानी स्वभाव के कारण डा0 जोशी किसी भी व्यवसाय में अधिक दिन तक नहीं टिक सके। प्रेमचन्द्र के साथ उनका साहित्यिक विवाद रहा। अपनी बात पर वे पहाड़ की तरह अडिग रहते थे। डा0 जोशी ने सुधा, माधुरी, सरस्वती, भारत मिश्र, कलकत्ता समाचार, विश्ववाणी, धर्मयुग, भाषा आदि। अनेक पत्र ​पत्रिकाओं में साहित्य और भाषा विज्ञान विषयक सैकड़ो से लेख लिखें। इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ मौलिक ग्रंथ भी रचे। जिनमें स्वाधीनता के सिद्धांत, भारत का इतिहास विक्रम और यूरोप जैसा मैने देखा रचे डा0 जोशी अपने विचारों को सहस्मय ढंग से पेश करने के हमेशा विरोधी रहे। इस सम्बंध में अक्सर कहा करते थे।
अपना कहा अपा ही समझे तो क्या समझे
मजा तब है जब आप कहे दूसरा समझे
कुमाऊंनी बोली के प्रति उनका बड़ा लगाव था तथा वे अपनी मातृ बोली में पत्राचार करते थे 16 अक्टूबर 1964 को वे चिर निद्रा में सो गये तथा 24 दिसम्बर 1974 को आपकी पत्नी दुर्गा देवी भी चिर निन्द्रा में सो गयी। प्रस्तुति :— कैलाश

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