Fri. Dec 4th, 2020

शक्ति न्यूज अल्मोड़ा |

1918 से प्रकाशित शक्ति अखबार का डिजीटल प्लेटफार्म

जानिये— विलुप्त होते उत्तराखण्ड के लोक प्रचलित आभूषण

1 min read

स्त्री जाति की सौंदर्य प्रसाधनों से अलंकृत करने की प्रवृत्ति जन्मजात रही है इसके प्रति महिला वर्ग का विशेष मोह रहा है जब धातु निर्मित आभूषणों का प्रारम्भ नहीं हुआ था तब भी अनेक प्रकार की फूल पत्तियां,सीपीयां, मूंगो, मोतियों हड्डियों आदि के आभूषण पहन कर अपनी आभूषण प्रियता का प्रदर्शन करती थी।
जहां तक उत्तराखण्ड की नारी का प्रश्न है उसे प्रकृति की ओर से पर्याप्त सौंदर्य प्राप्त है फिर भी अन्य क्षेत्र की महिलाओं के समान वे आभूषणों के लिए लालायित रहती है। यहां के लोकगीतों, लोकगाथाओं, तथा संस्कार गीतों में जिसका वर्णन सुनने को मिलता हैं उनमें से माथे की बिंदिया, नाक की नथुली(नथ) कान की बालिया, झुमके, गले का सुत (हसिया) हाथों में धागुले (कड़े) पैरों में झांवर, अंगूलियों में अंगूठी, गले का हार, आदि का वर्णन होता आया है।

यह उल्लेखनीय है आधुनिक आभूषणों के आगमन के पूर्व यहा पर कतियय मध्यकालीन आभूषणों का भी प्रचार हुआ लेकिन अब मध्यकालीन आभूषण विलुप्त प्राप्त हो गए है केवल कतियय पिछड़े इलाकों में ही यदा कदा दिखाई पड़ते है। आज अब इनके संरक्षण की आवश्यकता है। जिनमें टीका, नथ या नथुली, बुलाक, मुनड़े, झुपझुपी (यह कानों में पहनने वाला एक चांदी का त्रिभुजाकार आभूषण है) सूतिया/दुबड़ा, सुत/सुता/ (हसुली) गलोबंद, चरेऊ, धमेल (यह चांदी के सिक्कों,चवनी, अठनी में कुण्डे लगाकर उन्हें धागे की मोटी डोरी में पिरोकर बनाया जाता था) मंगलसूत्र, धागुले, ढोका एक हस्ताभरण था) पौंची, अंगूठी, झांवर (ये चांदी या गिलट के बने होते है) बिछुवा, पायजेब, पायल, चैनट्टी अमिति (यह चांदी की तीन तारों को एक साथ बटकर कए गोल रिंग के रुप में होती थी) पैरे (चांदी अथवा गिलट का भारी आभूषण) लच्छे (चांदी या गिलट के तारों को उमेठ कर लच्छी के रुप में बने होने के कारण ही इसका नाम लच्छा पड़ा था। सुती (यह शिशुओं का आभूषण है) धागुली कमरज्योड़ी।
आज अब न तो शिशुओं को उनके आभूषण पहनाये जाते है और ना हीं यहां के प्रचलित आभूषण ही दिखाई देते है जो आज के आधुनिकता में विलुप्त होते जा रहे है।

प्रस्तुति:— भूमिका भण्डारी

Copyright © शक्ति न्यूज़ | Newsphere by AF themes.