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जानिये— कूर्मांचल के साहित्यकार गुमानी पंत

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काशीपुर में 27 गते फाल्गुन 1847 में देवनिधि और देवमंजरी के घर में पैदा हुए लोकरत्न पंत (गुमानी पंत) मूल रुप से उप्राड़ा के पंत थे। इनका बाल्य काल पितामह पुरुषोत्तम पंत के सानिध्य में बीता।
गुमानी पंत ने गोरखाली, संस्कृत एवं खड़ी बोली में रचना की है उस समय साधनों का अभाव था फलस्वरुप गुमानी की लिखी कवितायें स्वानत: सुखाय ही रही। उस समय भोज पत्र या हाथ से निर्मित कागज पर ही उन्होंने कवितायें लिखी जो विभिन्न भाषाओं में लिखी गई थी का संग्रह कर वर्ष 1897 में तत्कालीन रैमजे इण्टर कालेज के अध्यापक देवीदत्त पाण्डे ने खोजबीन कर मुद्रित करवायी। अल्पवेतन भोगी देवीदत्त पाण्डे मुद्रण कर भार ग्रहण नहीं कर सके तब चीनाखान अल्मोड़ा निवासी डिप्टी कलैक्टर धर्मानन्द जोशी के प्रोत्साहन पर इन्होंने मुद्रित करवा कर प्रकाशित किया।
कवि गुमानी पंत भारतेन्दु हरीशचन्द्र से कई दशाब्दि पूर्व से ही खड़ी बोली के सर्वप्रथम कवि थे जिन्हें जन्म देने का श्रेय कूर्मांचल को है। वे तत्कालीन काशीपुर राज्य के कवि थे। राजनीतिक रुप से गुमानी सर्वप्रथम काशीपुर नरेश गुमान सिंह देव की राजसभा में नियुक्त हुये। गुमानी का रामनाम पंचपंचा शिखा, राममहिमा गंगाज्ञातक,जग्गनाथ शष्टक, कृष्णाष्टक, कालिकाष्टक, शतोपदेश आदि अनेकों कृतिया है।
कवि गुमानी ने कुमाऊं में चन्द्रवंश की समाप्ति के बाद दो शासन कालों को देखा। गोरखा एवं अंग्रेज और इसलिये ही तत्कालीन वातावरण की छाप उनकी कविता से स्पष्ट है। ये दोनों शासन अत्याचार, दमन, बेगारप्रथा से पूर्ण थे। कवि की कविताओं में इनकी यथेष्ट छाप है। गोरखा अत्याचार में कवि का स्वर फूटा और उन्होंने लिखा:— दिन दिन खजान का भार का बोकणा ले।
शिव शिव बुकि में बाल नै एक कैका।।
तदपि न तेरि मुल्क लै छोड़ि भाजा।
इति वदति गुमानी धन्य गोरखाली राजा।।
पद बतलाता है गोरखा राज्य की शासन बेगार ऐसी जिसमें लोगों की चुटिया के बाल तक नहीं रहे
जब गोरखों राजसत्ता अंग्रेजों ने समाप्त कर डाली और पराधीनता के अत्याचारों पर उन्होंने लिखा।
आई रहा कलि भूतल में
अब छाई रहा छल पाप निसानी
हैरत है कवि विपृ गुमानी।
जो दिन सेतुन में, नदियां सब रेतिन के अटकाय फिरेगी जा दिन नाव समान बनी कछु माटि शिला जलवाज तरेगी
वा दिन मेहव घटा धरती पर ऊपर से बलखाय गिरेगी पा दिन जानि कहे गुमानी कहे इत छोड़ विलापत जाय
करेगी।
इसी प्रकार गुमानी ने नन्दादेवी मंदिर के बारे में अपनी कविता में लिखा जब नन्दादेवी को स्थानीय मल्ला महल (वर्तमान अल्मोड़ा कचहरी) से नन्दादेवी मन्दिर में स्थापित किया। तब उन्होंने लिखा
विष्णु का देवाल उखाड़ा —उपर बंगला बना खरा
महाराज का महल ढ़हाया , बेड़ीखाना वहां धरा मल्ले महल उड़ाई नन्दा, बंगले से है वहा भरा अंग्रेजों ने अल्मोड़े का नक्शा और ही और करा। यह कहा जा सकता है कि गुमानी भारतेन्दु हरीश चन्द्र से कई दशाब्दि पूर्व से ही खड़ी बोली के सर्वप्रथम् कवि थे।

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