May 26, 2022

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जानिये— सरला बहन का विराट व्यक्तित्व

5 अप्रैल 1901 को
स्विस— जर्मन दंपत्ति से उत्पन्न सरला बहन का जन्म लंदन जैसे बड़े शहर में हुआ उनके माता—पिता ने उनका नाम कैथरीन मेरी हैनीमन रखा। बचपन में ही माता—पिता की मृत्यु हो जाने के कारण उनका पालन—पोषण उनकी दादी ने किया और उनकी दादी ने अपने व्यक्तित्व की छाप उन पर ऐसी छोड़ी कि लक्ष्मी आश्रम कौसानी में बच्चों के बीच काम करते हुए कई बार अपने बचपन की बातों के संदर्भ में अपनी दादी को बड़े गर्व से या​द करती थी। प्रथम विश्व युद्ध के समय वे बहुत छोटी थी जब उन्होंने दुनिया की हिंसा अविश्वास तथा भुखमरी देखी थी और इस युद्ध का जबरदस्त असर उन पर पड़ा। स्विस—जर्मन दंपति की संतान होने के कारण इंगलैण्ड उन्हें शत्रुपुत्री के रुप में देखता था। जिससे उन्हें विद्यालय एवम् समाज में उपेक्षा का सामना करना पड़ा और इसका उन्हें कटु अनुभव हुआ और उन्होंने यह समझ लिया था कि राष्ट्रवाद सीमित स्वार्थो से अभिप्रेरित ही मानवता के विशाल परिवार को बुरी तरह तोड़ देता हैं फलस्वरुप कैथरीन अधिक से अधिक मानवीय वातावरण के लिये स​मर्पित होने लगी और 1932 में भारत आ गई। भारत आने से पूर्व ही उन्होंने इंग्लैण्ड में गांधी जी के चर्खे पर आधारित अहिंसक क्रान्ति के बारे में सुनी तथा चर्खे द्वारा स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था का विचार उन्हें अत्यधिक प्रभावित कर गया और गांधी जी के विचार के मूल को समझ गई।
भारत में 4 वर्ष उदयपुर में शिक्षण कार्य करने के बाद वे 1936 में सेवाग्राम वर्धा में बापू के चरणों में आ पहुंची। बापू सेवकों की प्रथम कसौटी सख्त व स्पष्ट करते थे तथा उन्होंने सिन्धी गांव में मलमूत्र सफाई का कार्य कैथरीन को दिया जो उन्होंने खुशी से किया तत्पश्चात् बापू ने उन्हें एक मुठ्ठी भर ऐसी कचरा भरी कपास उन्हें साफ करने को दी जिसे साफ करने में पूरा दिन लग गया इस प्रकार बापू के यहां उनके धैर्य की परीक्षा हो गई और वे इस प​रीक्षा में ऐसी सफल हुई कि बापू की परमप्रिय शिष्या बन गई और उनके लिये जीवन पर्यन्त कार्य करती रहीं।
वर्धा में लम्बे समय तक अस्वस्थ रहने पर बापू ने उन्हें कौसानी के समीप चनौदा गांधी आश्रम में एक वर्ष आराम करने के लिये 1941 में भेज दिया। एक वर्ष पूरा हुआ और 1942 का आन्दोलन पूरे देश में हो गया वे स्वत: ही कुमाऊं के स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़ गई तथा कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रमण कर वे यहां के जनजीवन में घुल—मिल गई तथा वहां की महिलाओं की प्रशंसक बन गई। उन्होंने अपनी आत्मकथा में कुमाऊंनी महिलाओं के बारे में लिखा है — ”पहाड़ की​ स्त्रियां बहुत परिश्रमी व हिम्मती होती है। हिमालय के सारे पहाड़ी इलाके में खेती का ज्यादातर काम बहिनें ही करती है” तथा 5 दिसम्बर 1946 को उन्होंने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की जो आज भी पर्वतीय क्षेत्र की बहिनों की सेवा शिक्षा व दीक्षा के लिये समर्पित ​है।
बापू के संपर्क में आते ही उन्होंने अपना नाम सरला रख लिया और पुराना नाम वह सदा के लिए भूल गई इतना ही नहीं वे घर ​परिवार व अपनी भाषा भी भूल गई और उन्होंने हिन्दी को ही अपनी भाषा बना लिया तथा वे विशुद्ध हिन्दी में ही बोलती थी। उन्होंने आश्रम में तीस वर्ष से अधिक समय तक रहकर पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं के उत्थान हेतु कार्य किया। वर्ष 1976 में उन्होंने अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ जिलों के मध्य धरमघर में आश्रम बना कर रहने लगी। तथा पर्यावरण के विषय में चिन्तन करने लगी। इतना ही नहीं पर्वतीय क्षेत्र की महिलाओं को उन्होंने शराबबंदी के लिए जागृत किया और स्वयं उनके साथ सहयोग किया। आश्रम में बच्चों पर उनका ध्यान हमेशा रहा। वर्ष 81 में अत्यधिक अस्वस्थ्य होने पर वे लक्ष्मी आश्रम कौसानी आ गयी और वहीं उन्होंने अपना शरीर त्यागा। सरला बहन त्याग की मूर्ति के साथ—साथ बापू की अनुयायी होने के साथ ही खादी और बापू के विचारों की प्रचारक भी रही।

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