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जानिये:— पूरा पढ़ें क्या है? कोट भ्रामरी का नन्दादेवी मेला

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जनपद बागेश्वर के अन्तर्गत गरुड़ विकासखण्ड के कत्यूर क्षेत्र में नन्दादेवी की विशेष पूजा भाद्रपद (भादोमाह) शुक्ल पक्ष की षष्टी से अष्टमी तक विशेष अनुष्ठान से नन्दा की पूजा की जाती है। नन्दादेवी की अनुष्ठानिक पूजा में ही षष्ठी को खाली जागरण , सप्तमी को भरा जागरण और अष्टमी को नन्दा की कदली वृक्षों से बनी मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।
खाली जागरण के देवी के अनुष्ठान के सहभागी (देवी के डंगरिया) जिस पर देवी की सवारी आती है। (अवतार होता है) वह व्रती रहता है तथा दिन रात के आठो प्रहर पर देवी की आरती अर्चना की जाती है उन्ही प्रहरों का सूचक मंदिर में शंख ध्वनि, झांज व भोकर (ताबे के निर्मित मेरी नुमा बाजा) तथा नगाड़े बजाते है उससे ज्ञात होता है देवी का प्रहर आया है।
सप्तमी को प्रात:पूजा के उपरान्त देवी का डंगरिया (अवतारी) छुरमल का डंगरिया (अवतारी) तथा देवी के उपासक भौवाई ग्राम के केला बनी (केवाणी) को मन्दिर में बाजे गाजे के साथ केले के पेड़ लेने जाते हैं जिससे देवी की विशेष मूर्ति का निर्माण किया जाता है तदन्तर उसे मंदिर के गर्भग्रह में स्थापित कर पूजा जाता है। यह अनुष्ठान सप्तमी को दिन होता है जिसे भरा जागरण कहा जाता है।
कोट भ्रामरी देवी की शक्ति पीठ मानी गई है जो विधि विधान से शक्ति यंत्र के ऊपर स्थापित है जिसकी स्थापना जगत गुरु शंकराचार्य ने कराई थी। भ्रामरी देवी वैष्णवी शक्ति है— इसकी पूजा भी नारायण और लक्ष्मी की पूजा विधि से की जाती हैं आज की नन्दा की तामसी पूजा का समय कोट में भ्रामरी की प्रतिमा पर पर्दा लगाया जाता है भ्रामरी और नन्दा के साथ प्राचीन तथा अर्वाचीन इतिहास भी जुड़ा है।
भ्रामरी देवी के साथ पौराणिक ‘अरुण राक्षस’ के वध की कथा जुड़ी है जो नन्दादेवी के साथ—साथ शुम्भ निशुम्भ के (वध) संहार की कथा जुड़ी है कहा जाता है कि दानवपुर (दानपुर) के राजा शुम्भ—निशुम्भ के राजकर्मचारी चण्ड—मुण्ड ने हिमांचल कृतश्रया अम्बिका को देखा था ऐसा ही मत पौराणिक विद्धानों का रहा।
कहते है कि पूर्व काल में दानपुर अर्थात् दानवपुर के मूल निवासी तथा तिब्बत के प्राचीन निवासी यक्ष थे श्रोणितपुर का दानव राजा वाणासुर था उसी दानवपुर के राजा शुम्भ—निशुम्भ ने नन्दा को देखा था इसलिए भगवती नन्दा का नाम शुम्भ—निशुम्भ मर्दिनी चण्ड—मुण्ड घातिनी पड़ा है।
नन्दा दुर्गा ने महिषासुर जो भैसे का रुप धारण कर नन्दा को मारने आया था उसका वध भी नन्दा ने किया था।
प्राचीन काल की दन्त कथा है कि नन्दा उसे थकाने—भ्रमित करने के लिए केले के वृक्षों के मध्य छिप गई इसी तथ्य के आधार पर आज भी नन्दा की मूर्ति केले के पेड़ से बनाई जाती है कहते है कि नन्दा का डंगरिया (अवतारी) हाथ में चावल लेकर उस केले की बनी पर ताड़ा (जोर से चावलों को छिटकना) मारता है। तो जो पेड़ हिल उठता है (उसी में देवी के छिपे होने की भावना से) उसे ही देवी की मूर्ति निर्माण में उपयुक्त समझा जाता है।
शक्ति पूजा कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़े रखने के लिये प्राचीन समय से चली आ रही महत्वपूर्ण परम्परा है। किम्बदन्त्यिों में कहा जाता है कि नन्दा की सात बहने गढ़वाल व कुमाऊं में पूजी जाती रही है। इसमें से राजेश्वरी देवी को बड़ी बहन का दर्जा अनेक लोक गाथाओं में दिया जाता है— बताते है नन्दा—राजेश्वर की पूजा का हरेला और कटार लेकर गढ़वाल से वाहक जब नन्दादेवी के यहां कत्यूर में आता है तभी वहां नन्दा की पूजा सम्पन्न होती है फिर वहीं संवाहक उस सामग्री के साथ अल्मोड़ा में नन्दा सुनन्दा के पास जाता है अब यह प्रथा कदाचित सिमट गई है।
कोट का अर्थ किला समझा जाता है किला राजा की सुरक्षा के लिये सुरक्षित स्थान और प्रबंध के साथ बनवाया जाता है।

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