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जानिये उदयशंकर कल्चरल सेंटर क्या था

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8 दिसम्बर 1900 को उदयपुर के झालावार स्टेट के मंत्री डा0 श्याम शंकर चौधरी के घर जन्में नृत्य सम्राट उदय शंकर 1917 में आर्ट स्कूल बंबई तथा 1920 में रायल कालेज आफ आर्ट्स लंदन से संगीत की उच्च शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत नृत्य की ओर अग्रसर हुवे और उन्होंने कला शिल्प की नृत्य मुद्राओं का समागम करके एक ऐसी नृत्य कला को जन्म दिया जो भारत की नृत्य की छाप सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो गयी।
रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रेरणा से उदयशंकर अल्मोड़ा में प्रसिद्ध वैज्ञानिक बोसीसेन के निवास कुन्दन हाउस पहुंचे और वे अल्मोड़ा नगर के प्राकृतिक सौंदर्य और मौसम से प्रभावित हुए तथा उन्होंने अल्मोड़ा नगर में ही सेंटर बनाने की तैयारी कर दी और उन्होंने रानीधारा और धारकीतूनी के ​बीच कुछ भूमि बंगले, मकान आदि किराये पर ले लिये तथा उसी स्थान पर उदयशंकर ने ‘उदयशंकर कल्चरल सेंटर इण्डिया’ अल्मोड़ा की शुरुआत की थी।
वर्ष 1938 से लेकर 1943 तक उदयशंकर कल्चरल सेंटर रानीधारा में ही चला तथा यहीं पर एक आडिटोरियम और स्टूडियों बनाया जिसमें तीन सौ से अधिक दर्शक बैठ सकते थे इस स्टूडियो में नृत्य की कथाएं चला करती थी तथा नृत्य एवम् संगीत का लोकशैली में रख रखाव व सम्पूर्ण देश में प्रचार हेतु विशेष कार्यक्रम रखे जाते थे।
इस सेंटर में नृत्य संयोजन एवम् ताल—लय के नाटकीय प्रभाव को भी उदयशंकर ने प्रशिक्षण में शामिल किया। सेंटर के प्रशिक्षु कलाकारो एवं प्रशिक्षकों तकनीकों से देश विदेश में नृत्य कार्यक्रमों हेतु भ्रमण के लिये एक टूरिज्म कंपनी का निर्माण भी उन्होंने किया नृत्य सम्राट उदयशंकर के अल्मोड़ा नगर में प्रवास के दिनों से पूर्व अल्मोड़ा अपने सांस्कृतिक और बौद्धिक क्रियाकलापों के कारण प्रसिद्ध था तब उस समय अल्मोड़ा नगर में स्वतंत्रता संग्राम में नवयुवकों को भाग लेने के लिए वातावरण बन चुका था।
वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक एवम् साहित्यिक गतिविधियों में भी तेजी आ चुकी थी। उदयशंकर के अल्मोड़ा आने से पूर्व अल्मोड़ा में गेय पद्धति पर आधारित रामलीला ने विश्व के सबसे बड़े नाटक (ग्यारह दिनों तक मंचन होने वाली रामलीला) ने स्थान बना लिया था यहां रामलीला के पात्र स्वयं मंच से गायन अभिनय करते हैं कालांतर में उदयशंकर की रामलीला ने अल्मोड़ा में धूम मचा दी।
उदय शंकर कला केन्द्र ने अल्मोड़ा के तत्कालीन नागरिकों के सामने जब रामलीला प्रस्तुत की तो लोग ठगे रह गये तब उदय शंकर ने छाया रुप में रामलीला प्रदर्शित की। तब शक्ति 4 अक्टूबर ​1941 को यह समाचार निम्न प्रकार ​प्रकाशित हुआ। उदयशंकर भारतीय संस्कृति केन्द्र में नवरात्र में काफी चहल—पहल रही। छायाभिनय तथा पात्रों द्वारा प्रस्तुत नृत्य प्रदर्शन ने हजारों दर्शकों को आ​कर्षित किया। पातालदेवी का सारा पहाड़ नरमुण्डों से परिवेष्ठित था जंगल को मंगलमय बनाने में संस्कृति केन्द्र ने जो सफलता प्राप्त की उसके दो वर्ष पूर्व तक शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी। उदय शंकर नृत्य केन्द्र एक मात्र से शुरु होकर 1 मार्च 31 अक्टूबर तक चलता था जिसके बाद प्रशिक्षित दल भारत के विभिन्न स्थानों और विदेशों में प्रदर्शन के लिए जाता था।
उदय शंकर को अल्मोड़ा नगर के खट्टे—मीठे अनुभवों से गुजरना पड़ा एक वर्ग जहां उनके कलात्मक व्यक्तित्व से प्रभावित था वहीं रुढ़ीवादी कुछ लोग उनकी आलोचना करने लगे। कड़वाहट भरे अनुभवों से उनका हृदय पसीज गया और उन्होंने कला का एक और बीज नगर में अंकुरित कर दिया था वह अल्मोड़ा को छोड़कर चल दिये थे पर उनकी छाप यहां के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लंबे समय तक बनी रही और यहां रामलीला मंचन में बीच—बीच में छाया चित्र दिखाने की परम्परा शुरु हो गई। नृत्य और संगीत में इसकी छाप पड़ गई।
1955 में जब वे अल्मोड़ा आए तो उनका नागरिक अभिनन्दन किया गया। लेकिन अल्मोड़ा नगर के कला प्रेमियों को न उदय शंकर को भुला पाये और न अल्मोड़ा के लोग ही उन्हें भुला पायें।
उदय शंकर की स्थलीय अल्मोड़ा के फलसीमा नामक स्थान में उदय शंकर नृत्य अकादमी की स्थापना की गयी है। जिसका शिलान्यास भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा 19 अक्टूबर 2002 को रखी गयी थी। तत्कालीन केन्द्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री जगमोहन की पहल पर यह उनकी याद में यह अकादमी बनी।

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