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जानिये— ज्योतिष शास्त्र में कूर्माचलीय विद्वानों का क्या रहा योगदान

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ग्यारवीं शताब्दी से पहले कूर्माचल में ज्योतिष का कोई इतिहास नहीं मिलता अंग्रेजों के आने से पहले तक कूर्मांचल में चंद, कत्यूरी, मानकोटी तथा गोरखा शासकों का शासन रहा ये सभी हिन्दू धर्म और भारतीय ज्ञान विज्ञानके रक्षक रहे। इन सभी के काल में ज्योर्तिविदों को यथेष्ठ राजाश्रृय मिला अत’ 12 वी शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी तक कूर्माचल में ज्योतिष शास्त्र का यथेष्ठ प्रचार—प्रसार रहा कालान्तर में कूर्मांचल के ज्योर्तिविदों ने न केवल कूर्मांचल में अपितु पूरे देश में अपने ज्ञान से उच्चतम स्थान प्राप्त किया। दरभंगा, नहान जुब्बल, पटियाला, ओपल, संभल, कपूरथला, रामपुर, जोधपुर आदि अनेक देशी राज्यों में कूर्मांचल के विद्वानों को राज ज्योतिषी एवं राजगुरु का सम्मान मिला। फलित ज्योतिषी में तो कूर्माचली विद्वानों ने विशेष गति दी। ऐसे अदभुत भविष्य वक्ता कूर्मांचल में अधिक हुए है। जिनका नाम गिनाना सम्भव नहीं है। लेकिन सिद्धांत (खगोल) ज्योतिष में कूर्मांचलीय विद्वानों का नाम सर्वोपरि है।
कूूर्मांचल में अनेकों खगोलविदों और पंचागकारों ने जन्म लिया है। इनमें परम सिद्धांत ग्रंथ के लेखक स्वर्गीय प्रेमबल्लभ पाण्डे का नाम सर्वोपरि है। यह ग्रन्थ ज्योतिष शास्त्र के सुप्रसिद्ध एवं सबसे प्राचीन एवं वैज्ञानिक ग्रन्थ ‘सूर्य सिद्धांत’ के आधार पर बना है।
ग्राम माला के स्व0 रुद्रदेव जोशी ने ज्योतिष चन्द्राक तथा यही के स्व0 देवकी नन्दन जोशी ने ‘हीराहस्कर’ नामक भौतिक ग्रन्थों की रचना की। मौलिक ग्रन्थों के अलावा अनेक विद्वानों ने लोकोपयोगी ‘संग्रहात्मक ज्योतिष’ग्रंथों का संपादन करके ज्योतिष शास्त्र के उत्थान में अमूल्य योगदान दिया।
सर्प के स्व0 देवीदत्त जोशी द्वारा सुगम ज्योतिष तथा स्व0 लक्ष्मीकांत कन्याल कृत ‘ज्योतिषतत्व प्रकाश’ का नाम विशेष रुप से उल्लेखनीय है।
दैनिक जीवन में तथा जनसाधारण में ज्योतिष का आधार होता है—पंचांग जो कि खगो​लीय ग्रह स्थिति का वैज्ञानिक एवम ​वार्षिक लेखा जोखा होता है तथा फलित के लिए भी एक आधार साथ ही इससे वार्षिक सांस्कृतिक पर्वो का भी ज्ञान होता है। इस क्षेत्र में कूर्मांचलीय विद्वान अग्रणीय रहे है। पूर्व में छापाखानों के अभाव में सतराली, माला, कोटा, पुष्करी आदि अनेक स्थानों में हस्तलिखित दीर्घाकार पंचांग प्रचलित होत थे। छापखानों के प्रचलित होने के बाद मुद्रित पंचांगों का प्रसार हुआ। मुद्रित पंचांगों में स्व0 आनन्द बल्लभ पाण्डे (कोटा नैनीताल) का नाम अग्रणीय है। जिन्होंने वर्षो तक पंचांग द्वारा ज्योतिष की सेवा की तथा अनेक लोगों को ज्योतिष एवं पंचाग गणना की दीक्षा दी। इसके ​बाद अनेकों पंचागंकार इन्ही के शिष्य थे। सिलौटी भीमताल निवासी स्व0 रामदत्त ज्योर्तिविद के वंशज आज वे गणेश मार्तण्ड पंचाग द्वारा ज्योतिष की सेवा कर रहे है। स्व0 लक्ष्मीकांत कन्याल, स्व0 गौरीदत्त कन्याल, स्व0 बद्रीदत्त पंत, स्व0 गौरी दत्त पंत, स्व0 हरीदत्त पंत, स्व0 नित्यानंद उपाध्याय, राजवैद्य, पं0 क्षेमानन्द पाण्डे (दिव्यभास्कर पंचांग), पं0 ठाकुरदास पंत(कुमाऊं मार्तण्ड पंचांग) आदि अनेकों लोगों ने इस शास्त्र का गौरव बढ़ावा। इसके साथ ही शिक्षा एवं ज्योतिष शास्त्र के शिक्षण प्रशिक्षण में भी अनेकों विद्वानों ने कूर्मांचल में नाम कमाया। जिनमें काशी विश्वविद्यालय में ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख प्राध्यापक केदार दत्त जोशी का नाम उल्लेखनीय है। इसके अलावा पं0 गणेश दत्त पाठक पं0 क्षेमानन्द जोशी आदि अनेक ज्योतिष शास्त्र के प्राध्यापक विश्वविद्यालयों में रहे।
ज्योतिष शास्त्र और ज्योतिष विद्या की विद्वत परम्परा अप्राय: कुमाऊं से लुप्त प्राय: होती जा रही है। जिसे सहेजने की आवश्यकता है ताकि ज्योतिष विद्या यथावत बनी रह सके।

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