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कुमाऊॅनी रामलीला

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उत्तराखण्ड में कई शैलियों में रामलीला का मंचन किया जाता है तथा दस दिनों तक मंचित की जाने वाली रामलीला को कुमाऊंनी रामलीला के नाम से जाना जाता है तथा यह अन्य प्रान्तों में की जाने वाली रामलीला से भिन्न है। इसकी शुरुआत अल्मोड़ा से हुई जिसका श्रेय अल्मोड़ा के मकीड़ी मुहल्ला निवासी तहसीलदार देवीदत्त जोशी को जाता है तथा 1860 में सर्वप्रथम अल्मोड़ा में उन्होंने इसका मंचन करवाया। 1860 में प्रारम्भ हुई यह रामलीला सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में धीरे—धीरे अपने पांव पसारने लगी और कुमाऊंनी रामलीला के नाम पर पहचान बनाने लगी।
कुमाऊं में मंचित की जाने वाली रामलीला से संबधित गतिविधियों का प्रारम्भ तालीम से प्रारम्भ होता है तथा इसके पात्रों को गेय पद्धति के आधार पर रिहर्सल करवाया जाता है तथा तालीम मास्टर सभी पात्रों को लयबद्ध तरीके से अभ्यास करवाता है।
यह ज्ञातव्य है कि पहाड़ों में विषम भौगोलिेक परिस्थितियों के चलते यहां पर प्रारम्भ में रामलीला का मंचन बिजली नहीं होने के कारण मंच के दोनों ओर मशाल जलाकर हुआ करता था तथा मंच और दर्शकों के मध्य चारों ओर मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेन लगा दी जाती थी। तब रामलीला बड़ी सहजता के साथ होती थी और दर्शक उसे श्रृद्धा भाव से ग्रहण करते थे तथा रामलीला के पात्र अपने गीतों और चौपाइयों का गायन उच्च स्वर में करते थे बिना किसी ध्वनि विस्तारक यंत्र के इनकी आवाज दर्शकों तक साफ सुनाई देती थी पात्रों का अभिनय दर्शकों को साफ—साफ दिखाई दे इसके लिए एक मशालची पात्र के साथ—साथ मंच पर चलता जाता था और एक प्रोम्पटर होता था जो पात्र को अगली पंक्ति क्या गानी है उसे बताता था। परम्परागत शैली की इस रामलीला में स्त्री पात्रों का अभिनय भी पुरुष कलाकारों के द्वारा ही किया जाता था।
अब इसके स्वरुप में बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है अब रंगमंच से स्त्रियों के जुड़ने के परिणाम स्वरुप स्त्री पात्रों का अभिनय ही नहीं वरन् पुरुष पात्रों का अभिनय भी स्त्रियां (बालिकायें) करने लगी है।
सन् 1939 में उदयशंकर कल्चर सेेन्टर द्वारा कुमाऊं की रामलीला से प्रभावित होकर छाया रामलीला का वृहद प्रदर्शन अल्मोड़ा में किया तथा इस प्रदर्शन से रामलीला कर्मियों में एक नई सोच का प्रादुर्भाव हुआ।
कुमाऊं के शहरों व ग्रामीण इलाकों में मंचित होने वाली रामलीला अब शारदीय नवरात्रों और उसके बाद दीपावली की नवरात्रियों में मंचित की जाने लगी हैं।
देवीदत्त जोशी द्वारा अल्मोड़ा से प्रारम्भ की गई रामलीला को बद्रीदत्त जोशी व गोविंद लाल साह ने आगे बढ़ाया बद्रेश्वर से प्रारम्भ हुई यह रामलीला बाद को अल्मोड़ा नगर के कई स्थानों पर मंचित की जाने लगी।

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