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विवाह संस्कार में बनाये जाने वाले लाडु, सुआल, समधी—समधन

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उत्तराखंड के कुमाऊ क्षेत्र में वर पक्ष और कन्या पक्ष के विवाह संस्कार की वैदिक पूजा पद्धति में श्री गणेश की पूजा का शुभारंभ पुरोहित द्वारा शंख घंट की ध्वनि के साथ मंत्रों के उचारण से करना और उसके बाद महिलाओं द्वारा लोक पक्ष की पंरापरिक विधाओं का शुभारंभ शंख, घंट ध्वनि और मंगलिक संस्कार के गीतों द्वारा किया जाना कुमाऊनी सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर सुसंस्कृति का शुभ लक्षण है। विवाह संस्कार में लाडु, सुआल के साथ सा​थ समधी—समधनी वर पक्ष और कन्या पक्ष की ओर से बनाना आवश्यक होता है। इस कार्य में पुरोहित और अन्य पुरूष वर्ग सम्मिलित नहीं होते इसमें केवल महिलाओं का ही योगदान रहता है। सुआल पथाई और रंगवाली करने से पूर्व घर की महिलाओं का घाघरा पिछोड़ा या साड़ी के साथ रंगवाली पिछोड़ा ओढ़ना आवश्यक होता है। महिलाओं के द्वारा मंगालिक संस्कार के गीतों में शुगन आंखर के गीतों में सर्वप्रथम शकूना दे के गीत के बाद सुआल पाथना लाडु की साम्रागी तैयार ​की जाती है और लाडु बनाना और समधी—समधन तैयार करना होता है और इसी प्रकार रंगवाली का पिछोड़ा तैयार करते हैं। इसमें सर्वप्रथम सुआल पथाने के कार्य का शुभारंभ शुगन आंखर के, शकूना दे के साथ साथ दूध से आटा गूथने का शुभारंभ सुहागिन महिलाओं द्वारा किया जाता है। परंतु उसके बाद इस कार्य में दक्ष महिलाओं का पूर्ण योगदान रहता है जिससे कि अन्य महिलाएं इस पंरापरिक कार्य को सीख सकती हैं। दूध से आटा गूंथने के बाद सर्वप्रथम विनायक बनाये जाते हैं श्री गणेश के इस नाम को सुआल पथाई में विनायक के नाम से जाना जाता है। पान के पत्ते में रोली, अक्षत, चंदन, फूल, पीली सरसो, हल्दी साबुत, सुपारी साबुत ​दक्षिणा स्वरूप रूपये रखकर उसके उपर दूब को रखकर रखते हैं जिसमें जड नीचे और पत्तियां उपर की ओर रखी जाती है।
विनायक बनाने का तरीका
आटे की एक पूरी बेल का उसके उपर गुबद की आकार की लोई बनाकर रखी जाती है। आटे की लंबी लंबी दो बत्तियां बनायी जाती है उनको पूरी में गुबंद से जोडते हुवे चार भाग बराबर करते हैं। यह चार भाग चार दिशाते हैं पूर्व ​पश्चिम उत्तर दक्षिण से यह जुड़ी हुवी आटे की बत्तियां हाथी की सूंड सी दिखायी देती है यही विनायक है। यह सर्वतोमुखी प्रगति का प्रतीक गजमुख श्री गणेश है।
इस तैयार विनायक को शंख घंट ध्वनि के साथ पूरब दिशा में दरवाजे की चौखट के उपर सुरक्षित स्थान में रखा जाता है। सुआल पाथे या बेले जाते हैं। सर्वप्रथम पांच रोट, पांच बधाई, पांच पान पत्ते के आकार, पांच गोजे, पांच लौंग या दाड़िम के फूलों का आकार के बनाये जाते है। इनके किनारे गोजे की तरह कनारे जाते है और अगिनत सुआल बेले जाते हैं। इनको धूप और छाया मे सुखाया जाता है।
सुआल तलने से पहले चूल्हे और अग्नि की परंपरागत पूजा के बाद चावल का आटा और तिल को अलग अलग कर भूना जाता है और गूड की चासनी तैयार की जाती है। कुछ महिलाएं सुआल तलती हैं और कुछ महिलाएं तिल और चावल के आटे में गूड की चासनी बनाकर समधी—समधन तैयार किया जाता है। साथ में कर्मकांड के मांगलिक गीत भी गाती है। एक ओर से महिलाओं के द्वारा सुआल इत्यादि बनाये जाने का कार्यक्रम दूसरी ओर से नाच गीतों का एक अदभुत दृश्य दिखायी देता है परंतु सुआल बनाने के बाद अग्नि प्रज्जवालित चूल्हे से कढ़ाई को हटाना अशुभ बना जाता है। उसमें चावल के आटे में गूड डालकर हलवा बनाना और सुआल और हवला बटाना शुभ मना जाता है।
—मीरा जोशी

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