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मां नन्दा देवी मन्दिर

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वेदों ने जिस हिमालय को देवात्मातुल्य माना है नन्दा उसी की पुत्राी है हालांकि देवी नन्दा को लेकर उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचल में अनेक कथाये, गाथायें, जागर प्रचलित हैं। अल्मोड़ा के नन्दादेवी मेले का प्रारम्भ और इसके कारणों की प्राप्त अधिकृत जानकारी के अनुसार इतिहासकारों का मामना है कि चंदवंशीय राजा बाज बहादुर चन्द्र यलगभग 1636-78 के शासन काल में गढ़वाल तथा भोट के राजाओं पर विजय प्राप्त करने पर उसने नन्दा की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा अल्मोड़ा के वर्तमान दुर्ग मल्ला महल के भीतरी भाग में की चन्द्र राजाओं ने नन्दा देवी कोे मानवी रुप में मान्यता दी। इसके हिसाब से विगत 350 वर्षो से यह मेला चला आ रहा है। कुमाऊं के नन्दा देवी मेले का मूल अल्मोड़ा हैं जो सबसे पुराना है। कालान्तर में अल्मोड़ा के मेलों को केन्द्र बिंदु बनाते हुए कुमाऊं के अन्य स्थानों पर यह मेला प्रारम्भ हुआ। कुमाऊं व गढ़वाल के जनजीवन में नन्दा का विशेष महत्व है कार्तिकेयपुर के सम्राट ललितसूरदेव, पदभट्टदेव, सुमिकराजदेव के ताम्रपत्रों में भगवती देवी नन्दा के प्रति श्रृद्धा प्रदर्शन कत्यूरी काल में नन्दा पूजा की ऐतिहासिकता प्रमाणित करता हैं। नन्दा भगवती चरण कमल, कमलासनाथ मूर्तिः- नन्दा के प्रति श्रृद्धा विश्वास भक्ति कत्यूरी काल में भी थी।
भगवती नन्दा सम्पूर्ण भारतीय हिमालयी अंचलों में अलग—अलग नामों से पूजी जाती है। उत्तराखण्ड में भगवती नन्दा का विशेष मान सम्मान हैं। नन्दा हमारी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं में रची बसी देवी है।
कुर्मांचल में नन्दा देवी के मन्दिर अल्मोड़ा, कत्यूर में रणचैला, तथा मल्ला दानपुर के भगड़ में हैं। गढ़वाल में लाता, नौटी, कालीमठ, देवराड़ा, कुरुड़, हिन्दौल, सेमली, भिंग, तल्लीधूरा, तथा गैर में इसके मन्दिर हैं। राजा बाज बहादुर के शासन काल में अल्मोड़ा नगर में भगवती नन्दा के सम्मान में धर्मिक सांस्कृतिक नन्दादेवी मेले का शुभारम्भ हुआ। वर्तमान समय में नन्दा देवी का मन्दिर बाज बहादुर चन्द्र के पुत्र उद्योत चन्द 1678-98 द्वारा बनवाया गया है। यह उद्योत चन्द्रेश्वर के नाम से प्रसिद्ध था। यह शिव का मन्दिर था आज भी जिस कक्ष में नन्दा की मूर्ति हैं उसके पिछले कक्ष में शिवलिंग स्थापित है उद्योंतचन्द के समय कुर्मांचल पर गढ़वाल एवं डौटी के राजाओं के एक साथ आक्रमण हुए इस जीत की खुशी में राजा ने विष्णु का देवाल, त्रिपुरा सुन्दरी, पार्वतीश्वर, तथा उद्योतचन्द्रेश्वर मन्दिरों का निर्माण किया इसी समय राजा ने राज महल का निर्माण् करवाया यह तल्ला महल के नाम से प्रसिद्ध है। भाद्र माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को नन्दा की पूजा की जाती है इसे एक लोक उत्सव के रुप में मनाया जाता है। राजा बाज बहादुर चन्द ने भगवती नन्दा के महात्म्य को समझते हुए पूजन तान्त्रिक पद्वति से की। नन्दा देवी के अवसर पर अल्मोड़ा में होने वाले मुख्य पूजा अनुष्ठान में भगवती नन्दा और चन्द शासकों की कुल देवी की एक साथ पूजा की जाती है। यह पूजा चन्दवंशज ही करते हैं। आज भी यह पूजा पद्वति विद्यमान है आज भी चन्दवंशजों द्वारा स्वर्गीय राजा भीम सिंह के भाई राजा स्व0 उदय राज सिंह के वंशज करन चन्द राज सिंह केसी बाबा काशीपुर यहां पूजा अर्चना करने आते है। उनके साथ उनके वंशज इस पूजा पद्वति में भाग लेते है।
धर्म ग्रन्थों में भगवती नन्दा के कई स्वरुप गिनाए गए है। उत्तराखण्ड में भगवती नन्दा का विशेष मान सम्मान है। भगवती नन्दा के अलग-अलग स्वरुपों के पूजन के तरीके भी अलग-अलग है तंत्रा विद्या की 10 विद्याओं में अलग-अलग तरह से पूजा विधानों को परिभाषित किया गया है। मंत्रों से सादगी पूर्ण पूजन के विधान भी देवी के स्वरुप के अनुसार बताये गये है।

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