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रक्षा बंधन का पौराणिक महत्व….

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-जगदीश जोशी
रक्षाबन्धन का पर्व हिन्दू धर्मानुयायीयों का प्रमुख पर्व है। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। हिन्दुओं के लिए रक्षाबंधन बहुत महत्व रखता है।रक्षाबंधन शब्द का अर्थ है कि रक्षा सूत्र में बँधना। सनातन संस्कृति में जब कोई भी ब्रहामण अपने यजमान के यहॉ कोई धार्मिक अनुष्ठान करता है तो अन्त में वह अपने यजमान को रक्षा सूत्र बॉधता है की जिसका भाव यह है कि अपनी रक्षा का दायित्व एक दूसरे को सौंपना।
ब्रहामण जब रक्षासूत्र बॉधता है तब यह मंत्र बोलता है….
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।
अर्थात् -जिस रक्षा सूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बॉधा गया था उसी रक्षाबंधन के पवित्र सूत्र को मैं तुम्हें बॉधता हूं जो तुम्हारी रक्षा करेगा।
रक्षा बंधन का राजा बलि से सम्बन्धित कथा का पुराणों में भी वर्णन आता है जो इस प्रकार है— कहते हैं जब राजा बलि ने निन्यानवे यग्य पूर्ण कर लिये तथा सौवां यग्य पूर्ण होने वाला था उसकी पूर्णाहूति पर स्वयं नारायण वामन के वेश में राजा बलि की यग्यशाला में पहुंच गये और दान में तीन पग धरती मॉगी। जिसमें भगवान ने दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया, राजा बलि ने तीसरे पग के लिए अपना सिर झुका दिया. भगवान ने बलि की दानवीरता से प्रसन्न होकर उसे पाताल का राजा बना दिया और वर मॉगने को कहा। बलि समझ गया कि यह स्वयं नारायण हैं, तब उसने भगवान से कहा कि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो आप दिन रात मेरे दरवाजे पर खडे होकर पहरेदारी करें। भगवान ने तथास्तु कह दिया. अब स्वयं नारायण राजा बलि के पहरेदार बन गये। जब बहुत दिन बीत जाने पर भगवान बैकुण्ठ नहीं लौटे तो माता लक्ष्मी को चिन्ता होने लगी। जब उन्हें पता चला कि भगवान तो राजा बलि के द्वारपाल बन गये हैं तो वह पाताल लोक पहुंची और राजा बलि को अपना भाई बनाकर उसके हाथ में रक्षा सूत्र बॉधा। तब बलि ने कहा मॉगो क्या चाहती हो तब माता लक्ष्मी ने कहा मुझे अपना द्वारपाल दे दो। राजा बलि समझ गया उसने भगवान को दायित्व से मुक्त कर दिया और भगवान माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ आ गये।
तभी से यह मंत्र बना— येन
बद्धो बलीराजा ….
सनातन परम्परा में भी किसी भी कर्मकाण्ड व अनुष्ठान की पूर्णाहुति बिना रक्षा सूत्र बॉधे पूर्ण नहीं होती। वर्तमान समय में सामान्यत: बहिनें अपने भाई को रक्षा बॉधती हैं. आज के समय में रक्षा बंधन केवल भाई बहन का त्यौहार बन कर रह गया है जबकि प्राचीन समय में रक्षा बंधन भाई- बहिन, ब्रहामण- यजमान ,पति -पत्नी सब एक दूसरे को रक्षा सूत्र बॉधते थे तथा एक दूसरे की रक्षा का प्रण भी लेते थे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक प्रसंग यह भी आता है कि एक बार देवताओं और असुरों में युद्घ छिड गया, यह युद्घ बारह वर्ष तक चला। असुरों ने युद्घ में इन्द्र को भी पराजित कर दिया। तब इन्द्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा सूत्र लिया और इन्द्र की दॉयी कलाई में बॉधकर युद्घ में भेज दिया। रक्षाबंधन के प्रभाव से असुर भाग खडे हुये और इन्द्र की विजय हुई। रक्षा बॉधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।
द्वापर में भी श्रीकृष्ण और द्रौपदी का भी प्रसंग आता है जब एक बार सुदर्शन चक्र से श्रीकृष्ण की अंगुली कट गई तो काफी खून बहने लगा यह देखकर द्रौपदी ने अपनी रेशमी साडी का पल्लू फाडकर घावपर बॉध दिया और रक्त बहना बन्द हो गया कहते हैं उसी उपकार का बदला श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के चीरहरण के समय चुकाया।


उत्तर भारत में श्रावणी पूर्णिमा को रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया जाता है जबकि दक्षिण भारत में समुद्री क्षेत्रों में नारियल पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता है |नारियल पूर्णिमा खासकर मछुआरों का त्यौहार है। मछुआरे इस दिन से भगवान इन्द्र और वरुण की पूजा करके मछली पकडने की शुरुआत करते हैं, समुद्र को नारियल चढाते हैं ताकि समुद्र देव हर प्रकार से रक्षा करें।
भारत में यह त्यौहार समाज का हर वर्ग अपने अपने तरीके से मनाता है। इस दिन जनेऊ धारण करने वाले अपनी जनेऊ बदलते हैं। इस कारण इस त्यौहार को उत्तर भारत में श्रावणी या ऱिषि तर्पण भी कहते हैं तथा दक्षिण में इसे अबित्तम भी कहा जाता है।

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