Fri. Aug 7th, 2020

शक्ति न्यूज अल्मोड़ा |

1918 से प्रकाशित शक्ति अखबार का डिजीटल प्लेटफार्म

नेपाल का दावा अनाधिकार चेष्टा है, पाल राज वंशजों ने जताई आपत्ति

1 min read

जगदीश जोशी वरिष्ठ पत्रकार नैनीताल *
भारत व नेपाल के बीच लिपूलेख, कालापानी और लिम्पियाधूरा से जुड़ा मुद्दा इस बीच खासा चर्चा में है। नेपाल सरकार इस क्षेत्र को अपना बता रही है। यह नहीं नेपाल सरकार ने प्रतिनिधि सभा मे इस मामले में संविधान संशोधन विधेयक पारित करा दिया है। केपी ओली सरकार ने नेपाल में बढ़ रहे भारत विरोधी माहौल के बीच शनिवार को विपक्षी पार्टियों से भी इस मामले में समर्थन हासिल कर लिया। एक मात्र जसपा की सांसद सरिता गिरी के निजी संशोधन प्रस्ताव रखा जोकि खारिज हो गया। नेपाल सरकार के इस रुख से भारत ने अपनी असहमति जता दी है। हालांकि अभी संविधान संशोधन विधेयक को नेशनल असेंबली में भी पारित कराना होगा। लेकिन यहां सत्तारूढ़ दल का बहुमत होने से इसमें कोई परेशानी नहीं होगी। इधर नेपाल सरकार शनिवार को ऐतिहासिक दिन बता रही हो लेकिन भारत व नेपाल के बीच हुई ऐतिहासिक सिगौली संधि के दौरान क्षेत्र में राज करने वाले पाल राजाओं के बंशज इसको मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

डा.महेंद्र पाल

नैनीताल के पूर्व सांसद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डा. महेंद्र पाल इसी परिवार से आते हैं। डा. पाल का कहना है कि कालापानी, लिपुलेख, लिम्पियाधुरा पर नेपाल के अंतर्गत कभी नहीं रहा। जबकि यही नहीं पश्चिमी नेपाल का बड़ा भू-भाग संधि तक पाल राजाओं की रियासत में शामिल था। सुगौली संधि में कई गांव नेपाल में चले गए। अंग्रेजों व गोरखा राजा के बीच हुई संधि में काली नदी को सीमा बनाया। अस्कोट में रह रहे पाल राजवंश के वर्तमान उत्तराधिकारी कुंवर भानु राज पाल भी इस मामले में यही प्रतिक्रिया दे चुके हैं। पूर्व सांसद डा. पाल का कहना है कि लंबा समय बीतने के बाद भारतीय भू भाग को अपने नक्शे में दिखाना नेपाल सरकार का सही कदम नहीं कहा जा सकता है। डा. पाल कहते हैं ऐसे में सिगौली संधि पर ही सवाल उठाए जा सकते हैं।

प्रो.अजय रावत

*छठी शताब्दी से भारत का भाग रहा लिपुलेख:- लिपुलेख, कालापानी व लिम्पिया धूरा आज नहीं छठी सदी से भारत का हिस्सा रहा है। जानेमाने इतिहासकार पर्यावरणविद प्रो.अजय रावत बताते हैं कि छठी सदी से यह इलाका कैलास मानसरोवर का मार्ग रहा है। यात्री नैनीताल जिसे त्रिऋषि सरोवर कहा जाता था होते हुए कैलास की इसी मार्ग से यात्रा करते थे।
टनकपुर से वापसी होती थी। सिंगोली संधि में कुमाऊं के छांगरु व टिंकर गांव नेपाल को दे दिए गए। ईस्ट इंडिया कम्पनी के 1815 में कुमाऊं में गोरखाओं से संघर्ष के बाद हुई संधि में अंग्रेजों ने तिब्बत के व्यापार पर पूरा ध्यान दिया। लिपुलेख दर्रे से ही यह कारोबार चलता रहा। कमिश्नर जीडब्लू ट्रेल व सर रैमजे ने इस व्यापार को न केवल महत्व दिया बल्कि 'रं' जनजाति को भी इसके लिए प्रोत्साहित किया। अल्मोड़ा के डिप्टी कमिश्नर रहे मिस्टर शेरिंग ने तिब्बत की जमीनी हकीकत जानने के किए इसी रास्ते यात्रा की थी। अस्कोट के राजा इस व्यापार से चुंगी यानि शुल्क लेते रहे। प्रो. रावत कहते हैं कि अंग्रजों के आने पर 1815 में कुमाऊं प्रोविंस पहला जिला बना। इसमें गढ़वाल के टिहरी रियासत को छोड़कर उत्तराखंड का अन्य इलाका शामिल था। 1838 में अल्मोड़ा व ब्रिटिश गढ़वाल दो जिले बने तथा 1891 में नैनीताल जिला बना। उस दौर में एक बार राजा फतेह साह ने तिब्बत के कुछ हिस्सों तक अपना क्षेत्र फैला दिया था। वहीं कभी भारत का फैलाव अफगानिस्तान तक था। इस आधार पर आज बात करना समयाचीन नहीं कहा जा सकता है। उन्होंने कहा भारत ईस्ट इंडिया कम्पनी के दौर की संधि को रोटी बेटी के रिश्ते के चलते आज भी मान रहा है। इसके बावजूद नेपाल की सम्बन्धित क्षेत्र का दावा सही नहीं कहा जा सकता है। यह केवल हठधर्मिता है कुछ और नहीं।

युवा पत्रकार हेम भट्ट

**नेपाल राष्ट्रवाद का ढोल पीट रहा:- नेपाल में नए नक्शे को लेकर चल रहे राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए देहरादून के युवा पत्रकार हेम भट्ट अपने पोर्टल 'weethe Democratic' में कहते हैं:- स्वामी विवेकानंद ने कहा था जिस राष्ट्र का मेरुदंड राजनीति है वो राष्ट्र अपने भीतर के झगड़े निपटाने के लिए पड़ोसी मुल्क से उलझना शुरू कर देता है और देखते ही देखते देश के लोग एकजुट हो जाते हैं। यह विदेश नीति की सामान्य प्रवर्ति भी है।कालापानी विवाद पर केपी ओली शर्मा सरकार ने भी ऐसा ही किया। देश में सरकार के प्रति जनता के बढ़ते अविश्वास को पुनः पाने के लिए ओली सरकार ने नेपाल की जनता को एक सब्जबाग दिखाया। उस जमीन को नक्शे पर उकेर दिया जो उसकी है ही नहीं। नेपाल की जनता की हमदर्दी पाने का इससे बड़ा अवसर और क्या हो सकता था। उसने एक झटके में भारत विरोधी राष्ट्रवाद को हवा दे दी। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, ऊपर से कोरोना का संकट, लॉकडाउन से लगभग बर्बाद हो चुकी अर्थव्यवस्था जैसे कई सवाल हैं जिनका जवाब नेपाल की जनता को चाहिए। इन सवालों का जवाब देने से आसान यह था कि राष्ट्रवाद का ढोल पीट दिया जाए। अब पेट की भूख केवल राष्ट्रवादी पानी से तो नहीं मिटने वाली।


Copyright © शक्ति न्यूज़ | Newsphere by AF themes.