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पहाड़ और घी संक्रन्ति

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घी संक्रान्ति त्यौहार कुमॉऊं में भाद्रपद मास के प्रथम दिवस को घी संक्रांति के रूप में मनाने की परम्परा रही है। इस दिन घी खाना आवश्यक माना जाता है। पुरानी कहावत है कि जो इस दिन घी नहीं खाता वह अगले जन्म में घौंघा बनता है। इसके मूल रूप में भाव यह था कि दुधारू गाय अथवा भैंस पालने में बडी मेहनत लगती है जो ऐसा करते हैं वही घी का सेवन कर सकते हैं लेकिन आलसी लोगों को यह नसीब नही हो सकता। अत: घौंघा बनने का भाव यही है कि आलसी होना। अगर मेहनत नही होगी तो आपकी खेती भी अच्छी नहीं होगी तथा आप पशुधन से भी बंचित रहेंगे यही घौंघा बनने का भाव है।(घौंघा से यंहा तात्पर्य आलसी से है।

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