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कूर्मांचल के संत — सोमवारी महाराज

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अल्मोड़ा—खैरना मोटर मार्ग के नौगांव पर कोसी और सिरोत का संगम है वहां पर एक शिवालय है शिवालय के लगभग 300 मीटर कोसी के दाहिनी तट पर एक रमणीक स्थान है इस स्थल के ऊपर की ओर पहाड़ी पर श्री 108 गुदड़ी बाबा की चेतन समाधि है यहां पर एक ऐसी मूर्ति शोभायमान थी यही मूर्ति सोमवारी कही जाती थी प्रत्येक सोमवार को भण्डारा करने पर आपको सोमवारी बाबा कहा जाता था सोमवारी बाबा का नाम परमानंद ब्रहमचारी था बाल्यावस्था में ही इन्होंने घर छोड़ा तथा विरक्त होकर समस्त तीर्थों का भ्रमण किया सोमवारी महाराज बाल ब्रहमचारी थे इनके आश्रम में स्त्रियों का प्रवेश वर्जित था। उन्हें दूर से दर्शन दिए जाते थे। सोमवार गिरी महाराज को पहले पहल सन् 1905 में देखा गया। किंतु एक बार विश्वत संक्रान्ति के दिन एक स्त्री छोटी सी टोकरी में चावल लेकर महाराज को भेंट देने हेतु काकड़ीघाट आश्रम में आई और सीधे आकर कुटी मेखला में खड़ी हो गई महाराज तुरंत खड़े हो गये और बड़े आदर के साथ उन्होंने उस स्त्री की भिक्षा ग्रहण कर ली उस स्त्री ने कुटी की परिक्रमा की और चली गई उस स्त्री को इतना आदर (जबकि किसी स्त्री को आश्रम में पर्दापण करने की आज्ञा नहीं थी) विश्वास था कि वह स्वयं भी अन्नपूर्णा थी महाराज को अन्नपूर्णा की सिद्धि थी। इनके आश्रम से कोई भी भूखा नहीं जाता था जिसको जो भी इच्छा खाने की हो वह महाराज की कृपा से उपलब्ध हो जाता था प्रसाद की इच्छा रखने वाले बटोहियों को मार्ग में प्रसाद भिजवाने की व्यवस्था थी एक बार एक सज्जन को नारंगी की इच्छा थी जब वे महाराज के आश्रम में पहुंचे तो उन्हें वहां एक टोकरी में नारंगी रखी मिली।
एक बार चार व्यक्ति काकड़ीघाट आश्रम में गये उनमें से एक सज्जन रसोई में गये— महाराज ने रसोई में सामान दुगना, तिगुना भिजवादिया। महाराज ने अपनी कुटिया से ही कहा कुछ परवाह नहीं सब सामान का भोजन बनाओ जैसे ही भोजन तैयार हुआ आश्रम में कुछ व्यक्ति और आ गये तथा बना भोजन कुछ नहीं बचा।
सोमवारी बाबा के भक्तों को यह विश्वास था कि वे दूसरी सृष्टि की रचना करने में सक्षम है। साधारण लोग इनको काकड़ीघाट के ब्रहमचारी क​हते थे इनकी दिन चर्या ऋषि मुनियों की भांति थी। उनके शरीर पर एक लंगोट के सिवा कुछ नहीं होता था सिर के बालों की जटायें उनके उज्जवल ललाट से खेलती रहती थी हाथ में चिलम रहती थी इनके आश्रम में अन्नपूर्णा शक्ति थी। सोमवारी महाराज जिस किसी भाग्यवान के सिर पर हाथ रख देते थे वह एक प्रकार से अजेय हो जाता था। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था बाद को सोमवारी बाबा पदमपुरी आश्रम में चले गये।
एक बार बाबा होम कर रहे थे तो उनकी उंगली जल गयी तब इन्होंने कहा ​अग्निदेव ने अब शरीर पकड़ लिया है थोड़े दिनों में बदल जायेगा इस घटना के कुछ दिन बाद ही जंगल के रास्ते एक हिरन हांपता हुआ आया और कान आगे करके पूंछ हिलाता हुआ महाराज की ओर देखने लगा उसे महाराज ने प्रसाद व पानी पिलाया सात दिन तक वह आता रहा और आठंवे दिन उस मृग ने अनायास ही शरीर त्याग दिया महाराज की आज्ञानुसार उसका दाह संस्कार विधिवत किया गया। सोमवार गिरी बद्रीनाथ बराबर जाते थे सन् 1914 से वे नहीं गये काकड़ीघाट में ज्यादा रहते थे परंतु ज्यादा प्रिय उन्हें पदमपुरी था। सन् 1919 के पौष शुक्ल् एकादशी के दिन मध्यान्ह आश्रम में आये और वहां उपस्थित सभी भक्तें को अपने घर चले जाने की आज्ञा दी आश्रम में उनके सेवक अंबादत्त जोशी उर्फ हरि भक्त बाबा ही साथ थे तथा उनसे उन्होंने कहा कि अब मेरा समय समाप्त हो गया है। प्रात: ब्रहम मूहूर्त में मैं इस शरीर को छोड़ दूंगा तुम संगम में चिता लगाकर मेरे शरीर को अग्निदेना अब सोमवारी महाराज के आश्रम पदमपुरी में संगमरमर की एक मूर्ति स्थापित की गई है।

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