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गोवर्धन पूजा पर विशेष

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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर इन्द्र के कोप से ब्रजवासियों की रक्षा की थी और तब से गोवर्धन तथा गोधन की पूजा जारी की। तब से यह गौ पूजा उत्सव के रुप में मनाया जाता है। इसे अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है। एक बार जब ब्रज के लोग इन्द्रदेव की पूजा की तैयारी कर रहे थे तो बालक से कृष्ण ने नन्दबाबा से पूछा आप लोग इन्द्र देव की पूजा क्यों करते हो? तब नन्द बाबा ने कहा कि इन्द्र देव की कृपा से ही वर्षा होती है व अन्न पैदा होता है। जिससे ब्रजवासियों का भरण पोषण होता है। यदि वह नाराज हो जायेंगे तो बड़ा अनर्थ हो जायेगा। बालक कृष्ण ने कहा कि जब इन्द्र देव इतनी सी बात से नाराज हो जाते है और ब्रज का अनर्थ कर सकते है तो उनकी पूजा क्यों करनी है। कृष्ण ने कहा कि इन्द्र की कृपा से नहीं बल्कि गोवर्धन की कृपा से वर्षा होती है इसलिए हमें गोवर्धन की पूजा करनी चाहिए। गोवर्धन से स्वाभाविक तात्पर्य गौवंश का संवर्धन, सुरक्षा एवं पालन से है। गोवर्धन का भाव यह है कि गोवर्धन पर्वत जिसके कारण गोकुल में वर्षा होती है तथा अन्न की पैदावार होती है। दूसरे अर्थ में गोवर्धन अथवा गोवंश का संवर्धन। गोवर्धन क्षेत्र में ब्रज की गायों का भरण पोषण होता है। ​अब श्री कृष्ण की बात मानकर सभी ब्रजवासी इन्द्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा करने लगे। इस बात से नाराज होकर इन्द्र ने मेघों को आदेश दिया कि गोकुल में जाकर मूसलाधार वर्षा कर दो। जब गोकुल में भयंकर वर्षा होने लगी तो सभी गोप गोपी बहुत भयभीत हो गये उन्होंने श्रीकृष्ण से रक्षा की पुकार की तब श्रीकृष्ण ने कहा तुम सब लोग गायों सहित गोवर्धन की शरण में चलो वहीं हमारी रक्षा करेंगे। तब श्रीकृष्ण ने अपनी एक उंगली पर गोवर्धन उठा लिया और उसकी छाया में समस्त ब्रजवासी व गायें आ गये। श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की माया से ब्रजवासियों के ऊपर अति​वृष्टि का कोई असर नहीं हुआ यह चमत्कार देखकर जब ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण को विष्णु के अवतार की कथा बताई तो इन्द्र अपनी मूर्खता के लिए क्षमा याचना करने श्रीकृष्ण के पास आये। श्रीकृष्ण ने 7 दिन तक गोवर्धन को अपनी उंगली से उठाये रखा तथा सातवें दिन गोवर्धन को नीचे ​रखा तथा ब्रजवासियों को कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन की पूजा करो तथा अन्नकूट उत्सव मनाओं तभी से यह पर्व गोवर्धन पूजा के नाम से मनाया जाने लगा। यह ब्रजवासियों का मुख्य पर्व है ।इस दिन गोवर्धन की पूजा व परिक्रमा की जाती है। गाय बैलों को स्नान कराकर उन्हें रंग लगाकर पूजा की जाती है। उन्हें गुड़, चावल खिलाया जाता है। उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है। कुमायूं में भी इस दिन गाय ​बच्छियों को तिलक आदि पूजन कर माला पहनाते है। गो ग्रास देकर पूजा आ​रती करते है।
गोवर्धनधराधार गोकुलत्राणकारक।
विष्णुबाहुक्रतोच्छाय गवां कोटिप्रदोभव।।
ऊॅं गोवर्धन धराय नम:।
ऊॅं गोवर्धन पर्वताय नम:। — जगदीश जोशी

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