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दूध बोली को मातृ भाषा घोषित किया जाना आज समय की आवश्यकता है -प्रोफेसर दिवा भट्ट

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कुमाऊँ विश्व विद्यालय की सेवानिवृत्त प्रोफेसर दिवा भट् ने अन्तरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस के अवसर पर कहा कि आज मातृ भाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता देना मातृ भाषा के प्रति धोखा है। वास्तव में मातृ भाषा का आशय वह भाषा अथवा बोली है जो बच्चे को अपनी माँ के स्तनपान के समय से सुनने को मिलती है। जिस परिवेश मे बचपन सुनने व बोलने में जाता है वही बोली को मातृ भाषा की संज्ञा दिया जाना न्यायोचित है। हिंदी को राज्यभाषा की संज्ञा कामकाज की भाषा के रूप में ही मान्यता दी जानी व्वहारिकता है।
यदि उत्तराखंड के परिपेक्षय में देखा जाय तो कुमाऊँनी, व गढ़वाली बोली को क्षेत्रीय मातृ भाषा की संज्ञा दिया जाना सही है। हमारे प्रदेश में कुमाऊँनी, गढ़वाली, जौनसारी ,थारू, वनरावत आदि अनेक बोली हैं। रंग जो सीमांत क्षेत्र की बोली है उसमे तिब्बती बोली की एक झलक देखने को मिल जाती है।
आज आवश्यकता इस बात की है जिस बोली में हम सहज अपने परिवार समाज व दैनिक व्यवहार में लिप्त रहते हैं हमे उसी बोली को मातृ भाषा की संज्ञा दे कर विकसित करना, करवाना, तथा मान्यता हेतु ठोस सकारात्मक पहल करना आज समय की आवश्यकता है। सोशियल मीडिया के माध्यम से हम जिस तरह क्षेत्रीय भाषा को प्रोत्साहित कर रहे हैं उसी तरह आम व्यवहार में भी लाना होगा दूधबोली अथवा मातृ भाषा अनुभूति व संवेदनशील बोली है जिससे संस्कार भी परिपक्व होते हैं।
प्रोफेसर दिवा भट्ट ने कहा यदि दूध बोली को मान्यता व प्रोत्साहित किये जाने के धरातल पर सार्थक पहल की जाय तभी अंतरराष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस सही मायने में मनाया जायेगा।

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