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नवरात्रि पर विशेष:— शक्ति या सती के अनेक रुप जानिये

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सगुण साकार परमात्मा के तीन रुपों की मान्यता में रचयिता पालक—पोषक के रुप में ब्रहमा—विष्णु महेश की स्वयम् भू माना जाता है अर्थात् उनका जन्म नहीं हुआ है। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती इनकी पत्नियां है। आध्यात्म की भाषा में इन्हें त्रिदेव कहते है। आर्ष साहित्य के अनुसार जो जन्मा और प्रगट हुआ है वह ईश्वर नहीं हो सकता। उस निराकार परमात्मा ने कल्पना की और एकाक्षर ब्रहम की अभिव्यक्ति हुई उसने अपने (विग्रह) शरीर से श्रृष्टि की। देवी कई शक्तियों से सम्पन्न है। माया से वह अनेक हो जाती है। यह सदाशिव की अर्धागिनी है जिसे जगदंबा भी कहते है। उन्हीं के तीन प्रमुख रुप है जो तीन शक्तियों नौ देवियों के रुप में पूजे जाते है अर्थात् सरस्वती लक्ष्मी और पार्वती। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी है। बसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रुप में मनाते है ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी है। लक्ष्मी जी बड़ी हुई तो वह नारायण के गुण प्रभाव का वर्णन सुनकर उन्हें पाने के लिये तपस्या करने लगी। लक्ष्मी की निष्ठा से प्रभावित होकर विष्णु ने उन्हें पत्नी रुप में स्वीकार किया। एक दूसरी कथा के अनुसार विष्णु ने नारद से छल किया और उन्हें वानर का रुप दे दिया। इससे क्रोधित होकर नारद ने विष्णु को शाप दिया था कि आपको मनुष्य रुप में जन्म लेकर स्त्री का वियोग सहना पड़ेगा इस शाप के कारण ही राम और सीता के रुप में जन्म लेकर विष्णु और लक्ष्मी का वियोग सहना पड़ा था। सती को ही पार्वती, दुर्गा, काली, गौरी, उमा, जगदम्बा, गिरिजा अम्बे, शेरा वाली, शैलपुत्री, चामुण्डा, अम्बिका आदि नामों से पुकारते है। यह सती के एक जन्म की ही नहीं कई जन्मों और रुपों की कहानी है। सती का दूसरा जन्म है और शिव को इस जन्म में भी पति रुप में पाने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या की थी। उन्हें गौरी, महागौरी, पहाड़ों वाली और शेरावाली कहा जाता है। अम्बे और दुर्गा का चित्रण पुराणों में भिन्न मिलता है। अम्बे या दुर्गा को श्रृष्टि की आदि शक्ति माना गया है जो सदाशिव की अर्धागिनी है। माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरुप माना गया है। नवरात्रि के अवसर पर माता पार्वती या शक्ति के लिये इनकी पूजा अर्चना की जाती हैं।

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