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पहाड़ की लोक कला के लिए समर्पित लोक गायिका नईमा खान उप्रेती, जन्म दिन पर विशेष

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जगदीश जोशी वरिष्ठ पत्रकार नैनीताल * पारे भिड़ा कौ छे भागि सूर सूर मुरली बाजि गै बिणुली बाजि गै” लोक गीत सत्तर के दशक में खूब पसंद किया गया। लोक गायिका नईमा खान उप्रेती के कंठ से निकले सुमधुर स्वर ने इस पर चार चांद लगा दिए थे। ऐसी नामचीन गायिका का जन्म सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में आज के दिन यानि 25 मई 1938 हुआ था। उनके पिता मो. शब्बीर खान म्युनिसिपल बोर्ड के सभासद व अध्यक्ष रहे। एडम्स इंटर कालेज में इंटरमीडिएट करने के दौरान सांकृतिक कार्यक्रमों में नईमा बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती रहीं। बताया जाता है कि एक बार रंगकर्मी मोहन उप्रेती भी उनके कार्यकम में जज रहे औऱ बाद में इन दोनों में हुई दोस्ती शादी तक पहुंची और आजीवन कायम रही। महिलाओं के मंच में आने में पर्दे के दौर में नईमा ने रंग मंच में कदम रखा। एनएसडी, पुणे फ़िल्म इन्सटीट्यूट सहित दूरदर्शन और बाद में पर्वतीय कला केंद्र तक उन्होंने थियेटर को कायम रखा। पहाड़ के लोक गीतों को देश ही नहीं विश्व पटल पर रखने के लिए लोक जीवन को समर्पित पति मोहन उप्रेती के साथ नईमा के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। 15 जून।2018 को उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली।

जहूर आलम

नईमा को याद करते हुए नैनीताल में रंगकर्म के लिए समर्पित शख्सियत युगमंच के अध्यक्ष जहूर आलम बताते हैं कि नईमा जी ने शास्त्रीय संगीत की तालीम ली थी लेकिन उनका पूरा जीवन पहाड़ के लोक संगीत के लिए समर्पित रहा। पहाड़ की वादियों में निर्झर झरने वाली लोक संगीत की धारा की अपने सुमधुर कंठ से देश विदेश तक पहुंचाने में उनकी अहम भूमिका रही। नईमा अपनी प्रतिभा के बल पर रंग मंच के हर किरदार को जीवंत कर देती थी। वह नृत्य में भी निपुण रही। दूरदर्शन में बतौर प्रड्यूसर उन्होंने कई नए प्रयोग किए। टीवी के श्वेत- श्याम से रंगीन होने पर बने पहले प्रोग्राम में उनकी अहम भूमिका रही। अपने अंतिम दिनों तक पति मोहन उप्रेती के स्थापित दिल्ली के पर्वतीय कला केंद्र में सक्रिय रही। जहूर कहते हैं कि नईमा को पहाड़ के लोक कला को संरक्षित करने के लिए हमेशा याद किया जाएगा।

चंद्र शेखर तिवारी)

देहरादून में कार्यरत अल्मोड़ा निवासी चंद्र शेखर तिवारी ने नईमा खान उप्रेती पर काफी कुछ जानकारी एकत्रित की है। तिवारी बताते हैं कि सत्तर के दशक में आकाशवाणी लखनऊ के उत्तरायण कर्यक्रम में पहाड़ के कई कलाकार गीत संगीत की प्रस्तुति देते थे। इनमें जीत सिंह नेगी, केशव अनुरागी, चंद्र सिंह राही, कबूतरी देवी, भानु राम सुकोटी, वीना तिवारी के साथ ही मोहन उप्रेती व नईमा खान उप्रेती भी शामिल रही। सभी लोक कलाकारों में अपना आकर्षण था। नईमा के गाए ” पारे भिड़ा कौ छे भागि सूर सूर मुरली बाजि गै बिणुली बाजि गै”” को सुनने का अलग ही आनंद था। उनकी आवाज में पहाड़ के लोक की ठसक थी। पहाड़ के लोक संगीत के कुशल चितेरे मोहन उप्रेती की कर्णप्रिय आवाज के साथ गाए गीत में उनकी आवाज मिसरी की तरह घुली रहती थी। उनका कहना है कि उस दौर के अल्मोड़ा में अलग अलग सम्प्रदाय के बीच हुई उनकी शादी का विरोध भी हुआ होगा लेकिन यह अल्मोड़ा की खाशियत ही कही जाएगी कि बाहर से मतभेद के बावजूद अंदर खाने इस रिश्ते को स्वीकार्य कर लिया गया। तिवारी कहते हैं कि नईमा जैसे लोक कलाकारों के गीत सुदूर जंगलों में न्यौली, घुघुती व कफ्फुए की आवाज में जिंदा रहेंगे। यही नहीं नईमा की जन्मस्थली अल्मोड़ा में उनकी यादों के दीये की लौ जरूर टिमटिमाती रहेगी।

मनमोहन चौधरी

सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में दिशा के माध्यम से रंगकर्म को जीवंत रखने वाले मनमोहन चौधरी नईमा खान उप्रेती को पूरी शिद्दत से याद करते हैं। उन्होंने बताया कि दिशा रंगशाला की शुरुआत के साल जून 1992 में अपने पति स्व.मोहन उप्रेती, बृजेन्द्र लाल साह व नैनीताल के बृज मोहन साह जैसी शख्शियतों के साथ अल्मोड़ा में उनसे मुलाकात हुई थी। उप्रेती जी से मिलने दिल्ली जाना होता था तो उनके घर भी जाते रहे। अल्मोड़ा से आए हैं पता होने पर नईमा जी का अलग ही स्नेह मिलता था। मोहन उप्रेती जी ने पहाड़ के लोक संगीत को बड़े स्तर के रंगमंच तक ले जाने में अहम भूमिका निभाई ।

मोहन उप्रेती व नईमा खान उप्रेती

सही मायने में इस उपलब्धि में नईमा का खासा योगदान रहा है। पर्वतीय कला केंद्र रगमंच के लिए शिक्षण संस्थान जैसा रहा है। थियेटर की दुनिया में इसका बड़ा नाम है। आज जब नईमा जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन पारे भिड़ा कौ छे भागि जैसे गानों से वो पहाड़ व संस्कृति प्रेमियों के बीच अपनी सुरीली आवाज से वह हमेशा जिंदा रहेंगी। मनमोहन चौधरी ने नईमा जी को।वीडियो के माध्यम से श्रद्धांजलि भी दी है।

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