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मुख्य शरीर को जतन करला—तबै हमरी पालना होली

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दशकों पूर्व कुमाऊं का शिक्षित समाज अपने परिचित रिश्तेदार को अपनी मातृभाषा (कुमाऊंनी) में पत्र लिखकर अपनत्व जताता था तब यह समझा जाता था कि अपने करीबी लोगों को चिठ्ठी लिखकर वह ‘नराई’ फिरा रहा हो। आज अब न तो चिठ्ठी पत्री ही लिखी जाती है और ना ही अपनी भाषा (कुमाऊंनी) बोली जाती है। बदलते जमाने के साथ अब कुशल क्षेम लेने का माध्यम मो​बाइल, व्हाटसअप, फेस बुक, आदि हो गए हैं पहाड़ में शिक्षा के प्रचार—प्रसार के साथ ही कुमाऊंनी और कुमाऊं की समृद्ध संस्कृति परम्परा विलुप्त होती जा रही है।
कुमाऊंनी चि​ठ्ठी में प्रथम वाक्य में ही सीख होती थी कि मुख्य देह को जतन करला फिर हमरी पालना होली अघा या सब कुशल छ: तॉ लै कुशल हुनली।
कुमाऊंनी चि​ठ्ठी के प्रारम्भिक वाक्य में ही पहाड़ में प्रश्न चिन्ह लग गया है— अब शरीर का जतन करने में भगवान भरोसे रहना होता है। आज वीरान होती बाखलिया,बाप—दादाओं की पुश्तैनी भूमि के पहरु बने आमा—बड़बाज्यू पर अजनबियों की कब गिद्ध नजर पड़ जाय कहना मुश्किल है घर की लटपटी भी गई और—और वृद्धों के प्राण भी। नारी की कब अस्मत लुट जाय घर से निकली नारी कब गायब हो जाय कहना मुश्किल है ऐसी जख्म देने वाली खबरे पहाड़ में सामान्य माने जाने लगी है। विरान होती बाखलियों के लिए हमारी सरकारे, नेतागण और बौद्धिकता की बकवास करने वाले कम जिम्मेदार नहीं है
आप कहेंगे कि मुख्य शरीर के जतन से इस तरह के बिन्दुओं का क्या संबंध है इससे समझने के लिए हमें अपने पहाड़ों के पुरानी परम्परा की ओर लौटना होगा।
पहले के पहाड़ में लकड़ी, पत्थर और पाल के परम्परागत आवास होते थे वनों में आग लगती थी तो ग्रामीण भागकर आग बुझाते थे उन्हे अपने हक— हकूकों का ख्याल रहता था। किन्तु पर्यावरण शब्द ने तो वनों को ही सिकुड़ कर रख दिया है पहाड़ का आदमी अपनी ही भूमि से खतरनाक पेड़ का काटने में कानूनी डर से थरथराया रहता है। पहाड़ में मुख्य शरीर का जतन करने की कृषि, बागवानी और सब्जी उत्पादन में जंगली जानवरों ने ग्रहण लगा दिया है।
पहाड़ में जीवन यापन की कठिनाइयों की अंधेरी निशा में मुख्य शरीर का जतन करना दु:खदाई हो चला है। तो ऐसे में कैसे होगा मुख्य शरीर का जतन
प्रस्तुति:— कैलाश पाण्डे

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