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आज है विश्वकर्मा दिवस

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आज ​आश्विन मास के प्रथम दिवस को 17 सितम्बर को देवताओं के शिल्पकार भगवान विश्कर्मा की जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा विश्व के प्रथम इंजीनीयर थे जगत पिता ब्रहमा जी के कहने पर विश्वकर्मा ने सुन्दर—सुन्दर नगरों का निर्माण किया जैसे इन्द्रपुरी, द्वा​रिका, ​हास्तिनापुर, स्वर्गलोक, लंका आदि भगवान विश्वकर्मा यंत्रों के देवता कहे जाते है। अपने शिल्पकला के लिए मशहूर भगवान विश्वकर्मा सभी देवताओं के आदरणीय है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विश्वकर्मा सृष्टि के ​रचियता ब्रहमा के सावतें धर्म पुत्र है। विश्वकर्मा को निर्माण का देवता माना जाता है उन्होंने देवताओं के लिए भव्य महलों हथियारों एवं सिंहासनों का निर्माण किया। मान्यता है कि असूरों का वध करने के लिए महर्षि दधिची की अस्थियों से देवराज इंद्र के लिए वद्र का निर्माण किया यह वद्र इतना प्रभावशाली था असुरों का सर्वनाश हो गया।
कुमाऊं में पशुधन की कामना के लिए आज ही के दिन खतडुवा पर्व मनाया जाता है। उततराखण्ड में प्रारम्भ से ही कृषि और पशुपालन आजीविका का मुख्य स्रोत रहा है। आज वे कृषि व पशुपालन से सम्बन्धित कई पारम्परिक लोक परम्परा में और तीज त्यौहार पहाड़ के ग्रामीण अंचलों में जीवित है इन त्यौहारों से हरियाली से सम्बन्धित हरेला, पिथौरागढ़ में मनाया जाने वाला हिलजात्रा ऐसा पर्व है जिसमें कृषि पशुपालन को विशिष्ट मुखौटों के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। पशुधन की प्रचुरता लुप्त उठाने का त्यौहार घी त्यार, के रुप में मनाया जाता है। इसी प्रकार खतडुवा पर्व भी मूलत: पशुओं की मंगल कामना के लिए मनाया जाने वाला पर्व है।
खतडुवा शब्द की उत्पत्ति खातड़ या खातड़ि शब्द से हुई है जिसका अर्थ है रजाई या अन्य गर्म कपड़े गौरतलब है कि भाद्र पद की समाप्ति से पहाड़ों में धीरे—धीरे जाड़ा शुरु हो जाता है। इस पर्व के दिन गांवों के लोग अपने पशुओं के गोठ (गोशाला) को विशेष रुप से साफ करते है। सायं के समय घर की महिलायें खतडुवा (छोटी सी मशाल) को जला कर उससे गौशाला के अंदर लगे मकड़ी के जालों को साफ करते है। और पूरे गौशाला में इस मशाल को घुमाया जाता है और भगवान से कामना की जाती है। कि इन पशुओं को दुख:बीमारी से सदैव दूर रखे।

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