January 12, 2022

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जीवन में संतुलन होना बहुत जरूरी है

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जीवन में संतुलन होना बहुत जरूरी है—न तो अति प्रेम, न उपेक्षा—मध्य। और जो मध्य में जीवन जीना सीख लेता है उसे जीवन की कुंजी मिल जाती है। जैसे आपने देखा हो, सर्कस में नट चलता है रस्सी पर—ठीक मध्य में, सम्हाल कर अपने को! कभी थोडा बायें झुकता है, कभी थोड़ा दायें। दायें झुकता है इसीलिए कि बायें न गिर जाये, बायें झुकता है इसीलिए कि दायें न गिर जाये। बस झुककर अपने संतुलन को बना लेता है और बीच में चलता जाता है। ऐसे ही जीवन में प्रत्येक व्यक्ति को मध्य को सम्हालना चाहिए। और जो बीच में चलना सीख ले, वह सत्य तक पहुंच जाता है।जीवन की हर प्रक्रिया में बीच में चलना सीखो। ठीक मध्य में होना जीवन सूत्र है। न तो अति प्रेम में पड़ जाना। क्योंकि अति मिठास सड़ांध पैदा कर देगी। न अति उदास हो जाना, क्योंकि अति कड़वाहट हानिकर हो जायेगी, हिंसा हो जायेगी। और यह संतुलन प्रत्येक व्यक्ति को अपने ही ढंग से खोजना होता है। इसके लिए कोई बंधे हुए सूत्र नहीं दिये जा सकते। यह कोई दूसरा नही कह सकता कि यह ठीक बंधा हुआ ऐसा सूत्र है, क्योंकि हर स्थिति में यह संतुलन अलग— अलग होगा। किसी दिन बच्चा बीमार है, उस दिन थोड़ा बायें झुकना होगा; किसी दिन बच्चा प्रसन्न है, उस दिन थोड़ा दायें झुकना होगा। किसी दिन बच्चे की जरूरत कुछ और है, किसी दिन जरूरत नहीं है। प्रतिदिन, प्रतिपल जरूरतें बदलती हैं। और जरूरतों के बदलने के साथ व्यक्ति को सम्यकरूपेण बदलते रहना चाहिए। यही सम्यक प्रेम है।दूसरों के साथ जीवन व्यव्हार करते समय इसका ही ध्यान रहे कि पर का हित हो सके, कल्याण हो सके। वह अपने जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हो, स्वतंत्र हो, व्यक्तित्ववान हो, आत्मवान हो, शांत हो, मस्त हो, परमात्मा का तलाशी हो। बस इतनी बातें खयाल में रहें, इन्हीं को सूत्र मानकर चलते—चलते न केवल दूसरों को हम ठीक राह दे सकेगे बल्कि उन्हें ठीक राह देते—देते हमे भी ठीक राह मिल जायेगी।

डॉ रमेश सिंह पाल

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