October 16, 2021

शक्ति न्यूज अल्मोड़ा |

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यह भी जानिये— कुली बेगार (पाठ — 2)

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गतांक से आगे………कुली उतार— उतार का शाब्दिक अर्थ नीचे उतर जाना है गांव से उतर कर लोग सड़क में पड़ाव के पास जमा होते थे इसलिए इस प्रथा को उतार कहा गया।
कुमाऊं के प्रत्येक जमींदार, हिस्सेदार को सरकार ने कुली उपनाम दिया था। जिसके पास जमीन हो वह कुली कहलाता था। भूमिहीन इस उपाधि से मुक्त था तथा कुमाऊं में जमीन का होना इज्जत की निशानी के स्थान पर कुली कलंक घोतक था।
प्रत्येक गांव में कुलियों की संख्या निर्धारित थी और सरकारी आज्ञा आने पर निर्धारित कुलियों को पड़ाव में उपस्थित होना पड़ता था तथा किसी विषय परिस्थिति में भी यह बारी नहीं छूटती थी तथा रिश्वत से भी यह प्रथा मुक्त नहीं थी तथा प्रत्येक कर्मचारी के लिये कुलियों की संख्या नियत थी तथा नाम मात्र की मजदूरी दी जाती थी।
कुली बेगार— बेगार का मतलब भी उस कार्य से है जिसके लिये मजदूरी कुछ भी नहीं दी जाती थी तथा गांव वालों से सरकारी कर्मचारी मुफ्त में अपना काम करवाते थे कुलियों के सर व पीठ पर घृणित सामाग्री झाडू, कमोड, पाट, गोमांस कुत्ते अण्डे मुर्गी के साथ महिलाओं और बच्चों को लादा जाता था।
बर्दायश— इसका अर्थ उस रसद से है जिसे सरकारी कर्मचारी दौरे के समय गांव वालों से बिना दाम दिए ही लिया करते थे।
शक्ति ने अपने संपादकीय लेखो तथा पाठकों के पत्रों के माध्यम से इस प्रथा को समूल नष्ट करने का बेड़ा उठाया और अपने संपादकीय के माध्यम से इस प्रथा की निन्दा करते हुए अपने 24 दिसम्बर 1918 के अंक में कुली प्रथा पर संपादकीय टिप्पणी करते हुए लिखा—
”अब समय नहीं है संसार में किसी रुप में भी दासत्व बाकी रहे यह निन्दनीय प्रथा जिसने कुमाऊं के तीन ग्रामवासियों को तबाह कर रखा है एक दाम उठ जानी चाहिये।
चन्द व गोरखा शासकों के काल में भी यह प्रथा प्रचलित थी किंतु उनके शासन में यह प्रथा इतनी भयानक नहीं थी। अंग्रेजी शासकों की समय कुली रजिस्टरों में नाम लिखे जाते थे तथा नौकरशाही के क्रूर शासन काल में इस प्रथा ने उग्र रुप धारण कर लिया था जो सहन शक्ति के परे थी इतना ही नहीं अंग्रेज शासक शेरिंग के समय में 300 तक कुली एक बार दौरे में जाने को विवश किये जाते थे इतना ही नहीं 18 वीं सदी के अंत में कविवर गुमानी ने इस आन्दोलन का दिगदर्शन अपनी कविता में इस प्रकार किया।
छिप—छिप कर खजाना का मारि का बोंझ नालै।
शिव—शिव चूली का बाल नै एक कैका।।
तदापि मुलुक भेटी छोड़ि नै कोई भाजा।
इति वदति गुमानी धन्य गोरखाली राजा।।
अर्थात् खजाने के बोझ ढ़ोते ढ़ोते सर के बाल भी नहीं बचे फिर भी गोरखा राजाओं का राज छोडकर कोई नही गया।
1913 में इस प्रथा को दूर करने के लिये शक्ति के संस्थापक संपादक बदरीदत्त पाण्डे ने इस प्रथा का अध्ययन कर कुछ लेख लिखे।
10 जनवरी 1921 को बदरीदत्त पाण्डे, हरगोविंद पंत, लाला चिरंजी लाल व लगभग 50 राष्ट्रीय दल के नवयुवक बागेशवर पहुंचे। 12 जनवरी को इस दल ने कुली उतार बंद करो नारों के साथ बागेश्वर शहर में जुलूस निकाला और 50 हजार से अधिक जनता कुली बेगार के विरुद्ध हो गई। डिप्टी ​कमिश्नर डाइबिल 21 अंग्रेजों के साथ 50 पुलिस वाले 500 गोलियों से लैस थे। डाइबिल गोली चलाना चाहता था पर अफसरों ने ऐसा करना उचित नहीं समझा क्योंकि 50 हजार जनता के सामने सरकारी शक्ति कम थी। डाइबिल ने हरगोविंद पंत, चिरंजी लाल व बदरीदत्त पाण्डे को बुलाया और वह बहुत बिगड़ा तथा कहा कि बागेश्वर में गदर मचाने आये हो। इस पर बदरीदत्त पाण्डे ने कहा कि डिप्टी कमिश्नर तुम जेल, फांसी सब कुछ कर सकते हो डिप्टी कमिश्नर ने बदरीदत्त पाण्डे को शहर छोड़कर जाने का लिख कर आदेश दिया और उसी समय जनता से कहा कि तीन बजे तक शहर छोड़ने का आदेश है यदि आप कुली बेगार देना चाहते हो तो बदरीदत्त शहर छोड़कर चला जायेगा नहीं देना है तो बदरीदत्त की लाश जायेगी वे नहीं जायेगें।
तब उपस्थित लोगों ने कहा वे बेगार नहीं देंगे तब बदरीदत्त पाण्डे ने कहा कि आज उत्तरायणी के पर्व है सामने गंगा बह रही है उधर बागनाथ का मंदिर है इन दोनों को साथी बनाकर शपथ लो कि कुली बेगार नहीं देंगे मनुष्य हो मनुष्य की तरह रहना सीखो और उसी समय कुली उतार के कंलक से जनता को मुक्ति मिल गई और कुली बेगार से संबंधित सभी रजिस्टर सरयू में बहा दिए गए और यह शान्तिपूर्ण तरीकों से हुआ तब महात्मा गांधी ने इसे एक रक्त पात्र शून्य क्रान्ति की संज्ञा दी और अपने पत्र यंगइण्डिया में लिखा ऐसा आन्दोलन कहीं भी नहीं हुआ जहां एक भी बूंद रक्त की नहीं बहीं और इसी अवसर पर पाण्डे जी को कुमाऊं केसरी की उपाधि प्रदान की गई।

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