November 13, 2021

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देवशयनी एकादशी….

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आषाढ़ शुक्ल एकादशी जिसे देवशयनी या योगिनी एकादशी कहा जाता है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान विष्णु समेत सभी देवता गण निद्रा में चले जाते हैं। जो 4 माह के बाद देवोत्थान एकादशी को निद्रा से जागेंगे।इसी अंतराल को चातुर्मास कहा जाता है। इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य जैसे विवाह ,यज्ञोपवीत ,गृह प्रवेश आदि नहीं किए जाते हैं। इस काल में सृष्टि का संपूर्ण संचालन भगवान भोलेनाथ के पास रहता है। इसीलिए चातुर्मास में भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना का विधान है।इस व्रत से संबंधित पौराणिक कथा इस प्रकार है कि—धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहते हैं कि हे केशव ! आषाढ़ शुक्ल एकादशी का क्या नाम है ?इस व्रत की क्या विधि है? तथा किस देवता का पूजन किया जाता है ?तब श्रीकृष्ण कहते हैं हे युधिष्ठिर! इस कथा को ब्रह्माजी ने नारदजी को कहा था वही कथा मैं तुम्हें सुनाता हूं। एक बार देवर्षि नारद जी ने ब्रह्मा जी से इस एकादशी के विषय में जानने की उत्सुकता प्रकट की तब ब्रह्मा जी ने बताया सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती सम्राट राज्य करते थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी किंतु भविष्य में क्या हो जाए यह कोई नहीं जानता । अतः वह भी इस बात से अनभिज्ञ थे कि उनके राज्य में शीघ्र ही भयंकर अकाल पड़ने वाला है। उनके राज्य में पूरे 3 वर्ष तक वर्षा न होने के कारण भयंकर अकाल पड़ा। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष से यज्ञ हवन पिंडदान कथा व्रत आदि में कमी हो गई। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी वेदना सुनाई। राजा इस स्थिति से पहले ही बहुत दुखी थे ।वह सोचने लगे कि मैंने ऐसा कौन सा पाप कर्म किया जिसका दंड मुझे इस रूप में मिल रहा है। फिर इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से राजा सेना लेकर जंगल की ओर चल दिए। जंगल में विचरण करते हुए एक दिन वह ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। ऋषि ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कुशल क्षेम पूछी। फिर जंगल में विचरने का प्रयोजन पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा महात्मन्! सब प्रकार से धर्म का पालन करते हुए भी मैं अपने राज्य में दुर्भिक्ष का दृश्य देख रहा हूं।आखिर किस कारण ऐसा हो रहा है ?कृपया समाधान बताएं ! यह सुनकर महर्षि ने कहा हे राजन ! सतयुग में छोटे से भी पाप का बड़ा दंड मिलता है। इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है ।ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य किसी को भी तप करने का अधिकार नहीं है। आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है यही कारण है कि आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक वह काल की गति को प्राप्त नहीं होगा तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगा। राजा ने कहा देव ! मैं उस निरपराध को मार दूं ,यह मेरा मन स्वीकार नहीं कर रहा है ।कृपा कर कोई दूसरा उपाय बताएं। तब महर्षि ने बताया आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें इस व्रत के प्रभाव से अवश्य वर्षा होगी। राजा अपनी राजधानी लौटे और चारों वर्णन सहित एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया। व्रत के प्रभाव से राज्य में खूब वर्षा हुई और पूरा राज धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

जगदीश जोशी

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