November 16, 2021

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डॉ. सुवर्ण रावत के नाटक ‘लाल और नीले’ से दून घाटी में रंगमंचीय हलचल

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देहरादून। कोरोना दौर से पहले कलाकारों ने अपना अभ्यास ऑनलाइन जारी रखा और अब हालात कुछ सुधरने पर कोरोना के प्रोटोकॉल का पालन करते हुए उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून के प्रेक्षागृह में लगातार 5 दिनों ’10 अक्टूबर से 14 अक्टूबर’ तक हर शाम नाटक ‘लाल और नीले’ के मंचन से ख़ूब हलचल रही। यह नाटक नब्बे के दशक में बैरी जॉन के निर्देशन में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की थिएटर-इन-एजुकेशन कम्पनी में किया गया था। इस नाटक का शानदार मंचन प्रतिष्ठित संस्था ‘कला दर्पण’ ने ‘आईना’ के सहयोग से किया। यह नाटक ‘डेविड होल्मन‛ के नाटक ‘पीसमकेर’ पर आधारित है। जिसका आलेख,परिकल्पना व निर्देशन डॉ. सुवर्ण रावत ‘ ने किया। नाटक की शुरुआत कठपुतलियों से होती है। जिसमें बहुत समय पहले, एक पुल के ज़रिए नीले और लाल लोगों के बीच आना-जाना, मिलना-जुलना होने से बहुत प्यार और ताल मेल रहता है। तभी एक दिन दोनों ओर के लोगों के बीच युद्ध छिड़ जाने से पुल की जगह दीवार ले लेती है और एक दूसरे के प्रति प्रेम-प्यार और भाई-चारे की जगह फैल जाता है- वैमनस्यता व अविश्ववास का ज़हर।एक अंतराल बाद, नाटक में उभरती कठपुतलियों का स्थान कलाकार लेते हैं।नाटक में जहाँ एक ओर नीलू की भूमिका सुरजीत दास व आदीप शर्मा ने बख़ूबी निभाई वहीं दूसरी ओर भोली व चौकीदार की भूमिकाओं में आरती शर्मा व अभिनव गोयल ने सशक्त अभिनय किया। लाली की भूमिका में प्रेरणा भल्ला का अभिनय भी सराहनीय रहा।वरिष्ठ रंगकर्मी टी. के. अग्रवाल और राम लाल भट्ट, क्रमशः प्रकाश व कठपुतली के माध्यम से नाटक में अपनी छाप छोड़ने में क़ामयाब रहे। सुरजीत दास की कोरियोग्राफी, दिनेश त्रिपाठी की वेशभूषा, कृतिका भारी का संगीत एवं परिणीति अरोरा की रूप सज्जा ने नाटक को प्रभावी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।रंगों के माध्यम से आज के परिपेक्ष में होने वाली समसमायिक घटनाओं पर नाटक सटीक चोट करता है। नाटक के बाद नाट्य-प्रक्रिया को लेकर हुए कलाकारों और दर्शकों के बीच के संवाद का संचालन डॉ. सुवर्ण रावत ने बख़ूबी किया। जिसमें दून घाटी के वरिष्ठ रंगकर्मी अवि नंदा, नीरा नंदा, नरेश बोहरा, गजेंद्र वर्मा, जागृति डोभाल, आलोक उल्फ़त, सुनील कैंथोला, मदन डुकलान, प्रदीप शर्मा, अतुल विशनोई, शैलजा शर्मा, पदम सिंह राजपूत, बद्रीश छावड़ा, डॉ. झंकार बनर्जी, दिनेश भट्ट, उत्तरा पंत बहुगुणा आदि अनेक स्थानीय रंगकर्मियो ने मंच के अदाकारों से रूबरू होकर बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। दर्शकों की इस तरह की नाटक के उपरांत की सक्रिय भागीदारी प्रशंसनीय रही।

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