October 11, 2021

शक्ति न्यूज अल्मोड़ा |

1918 से प्रकाशित शक्ति अखबार का डिजीटल प्लेटफार्म

श्राद्ध की महिमा

1 min read
index
index
previous arrow
next arrow

श्रद्धया पितृन् उद्दिश्य क्रियते यत् कर्म तत् श्राद्धं।।
पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा पूर्वक किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं। अपने मृत पित्रगण के उद्देश्य से श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है।इसे ही पित्र यज्ञ भी कहते हैं।
महर्षि पाराशर जी के अनुसार- देश, काल तथा पात्र में हविष्यादि विधि द्वारा जो कर्म, तिल, जौ, और कुश तथा मंत्रों से युक्त होकर श्रद्धा पूर्वक किया जाए वही श्राद्ध है।
महर्षि पुलस्त्य के अनुसार- जिस कर्म विशेष में दुग्ध, घृत और मधु से युक्त अच्छी प्रकार से पकाए हुए व्यंजन को श्रद्धा पूर्वक पित्रगण के उद्देश्य से ब्राह्मण आदि को प्रदान किया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।
इसी प्रकार ब्रह्म पुराण में भी श्राद्ध का लक्षण लिखा है- देश काल और पात्र में विधि पूर्वक श्रद्धा से पितरों के उद्देश्य से जो ब्राह्मण को दिया जाए उसे श्राद्ध कहते हैं।
जो भी व्यक्ति विधि पूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करता है वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है। तथा फिर संसार चक्र में नहीं आता। अतः व्यक्ति को पितरों की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस संसार में श्राद्ध करने वाले के श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याणकारक उपाय नहीं है।
इस तथ्य की पुष्टि महर्षि सुमंतु द्वारा भी की गई है-
श्रद्धात् परतरं नान्यच्श्रेयस्करमुदाहतम्।
तस्मात् सर्वयत्नेन श्राद्धं कुर्याद्विचक्षण:।
अर्थात्- इस जगत में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याण प्रद उपाय नहीं है अतः बुद्धिमान मनुष्य को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए।
इतना ही नहीं श्राद्ध अपने अनुष्ठाता की आयु को बढ़ा देता है, पुत्र प्रदान कर कुल परंपरा को अक्षुण्ण रखता है। धन-धान्य से परिपूर्ण करता है। शरीर में बल और पौरुष का संचार करता है। पुष्टि प्रदान करता है और यश का विस्तार करते हुए सभी प्रकार के सुख प्रदान करता है।
श्राद्ध से मुक्ति- इस प्रकार श्राद्ध सांसारिक जीवन को तो सुखमय बनाता ही है परलोक को भी सुधारता है और अंत में मुक्ति भी प्रदान करता है।
मार्कंडेय पुराण के अनुसार- आयु:,प्रजां, धनं, विद्यां, स्वर्गं, मोक्षं, सुखानि च।
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर:श्रद्धातर्पिता:।
अर्थात्- श्राद्ध से संतुष्ट होकर पित्रगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, संतति ,धन, विद्या, राज्य, सुख, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करता है।
अत्रि संहिता के अनुसार- जो पुत्र, पौत्र, भ्राता अथवा दैहित्र आदि पित्र कार्य में संलग्न रहते हैं वह निश्चय ही परम गति को प्राप्त होते हैं ।
श्राद्ध न करने से हानि- शास्त्रों में श्राद्ध न करने से जो हानियां बताई गई हैं उसे जानकर शरीर कंपित हो जाता है। यह सर्वविदित है की मृत व्यक्ति इस महायात्रा में अपना स्थूल शरीर भी नहीं ले जा सकता है तब अन्न जल कैसे ले जा सकता है। उस समय उसके सगे संबंधी उसे जो कुछ देते हैं वही उसे मिलता है। शास्त्रों ने मरणोपरांत पिंडदान की व्यवस्था की है। सर्वप्रथम शव यात्रा के अंतर्गत 6 पिंड दिए जाते हैं जिनसे भूमि के अधिष्ठातृ देवताओं की प्रसन्नता तथा भूत पिशाचों द्वारा होने वाली बाधाओं का निराकरण आदि प्रयोजन सिद्ध होते हैं। अब उसे( मृत आत्मा) को आगे भी भोजन की आवश्यकता पड़ती है जो उत्तम षोडशी में दिए जाने वाले पिंडदान से से प्राप्त होता है। यदि सगे संबंधी पुत्र, पौत्र आदि ना दे तो उसे वहां भूख प्यास से बहुत दारुण कष्ट होता है तथा श्राद्ध न करने वालों को भी पग-पग पर कष्ट का सामना करना पड़ता है।
ब्रह्म पुराण के अनुसार-
श्राद्धं न कुरुते मोहात्, तस्य रक्तं पिबन्ति ते।
मृत्यु तिथि तथा पितृपक्ष में श्राद्ध करना आवश्यक- वर्तमान समय में अधिकांश लोग रस्म रिवाज की दृष्टि से ही श्राद्ध करने लगे हैं परंतु श्रद्धा भक्ति द्वारा शास्त्रोक्त विधि से किया हुआ श्राद्ध ही सर्वाधिक कल्याण प्रदान करता है। अतः प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा पूर्वक शास्त्रोक्त विधि से यथा समय श्राद्ध करना चाहिए। पितृपक्ष के साथ पितरों का विशेष संबंध रहता है। भाद्र शुक्ल पूर्णिमा से पितरों का दिन आरंभ होता है जो अमावस्या तक रहता है। शुक्ल पक्ष पितरों की रात्रि कही गई है। मनु स्मृति के अनुसार- मनुष्य का एक मास पितरों का एक अहोरात्र (दिन-रात) होता है। मास में 2 पक्ष होते हैं, मनुष्यों का कृष्ण पक्ष पितरों के कर्म का दिन और शुक्ल पक्ष पितरों के सोने के लिए रात्रि होती है।
यही कारण है कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृपक्ष में पित्रों को याद करने का विधान है ऐसा करने से पितरों को प्रतिदिन भोजन मिल जाता है। इसलिए पितृपक्ष में श्राद्ध करने की विशेष महिमा बताई गई है।
श्राद्ध में पंचबलि विधि- श्राद्ध में अलग-अलग 5 पत्तों पर भोजन सामग्री रखकर निम्न प्रकार पंचवली करनी चाहिए।
1- गो बलि- (पत्ते में)- मंडल के बाहर पश्चिम की ओर सब्य होकर निम्न मंत्र के साथ-
सौरभेय्य: सर्वहिता: पवित्रा :पुण्यराशय:।
प्रतिगृहन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातर:।।इदं गोभ्यो नम:
2-श्वान बलि-(पत्ते पर) जनेऊ को कंठी कर निम्न मंत्र के साथ-
द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलौद्भवौ।
ताभ्यांमन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ।।
3-काग बलि (पृथ्वी पर) अपसव्य होकर- निम्न मंत्र के साथ कौवे को भूमि पर अन्न दें
ऐन्द्रवारुणवायब्या याभ्यां वै नैवृतास्तथा। वायसा प्रतिगृहन्तु भूमौ पिण्डं मयोंजताम्।।
4- देव बलि- पत्ते पर सब्य होकर निम्न मंत्र के साथ-
देवा:, मनुष्या, पशवो वयांसि सिद्धा सयक्क्षोरगदैत्यसंगा।
प्रेता पिशाचास्तरव :समस्ता ये चान्नमिच्छति मया प्रदत्तम्।।
5- पिपीलिकागदि बलि-(पत्ते पर )- निम्न मंत्र के साथ-
पिपीलिका: कीटपतंगाद्या बुभुक्षिता कर्मनिबन्धबद्धा।
तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु।।
इदं अन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम
जो मनुष्य अपने सामर्थ्य के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करता है वह साक्षात ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंत समस्त प्राणियों को तृप्त करता है। श्रद्धा पूर्वक विधि विधान से श्राद्ध करने वाला मनुष्य ब्रह्मा, इंद्र, रूद्र, अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, वायु, विश्वदेव, पित्रगण, मनुष्य गण, पशु—पक्षी गण, समस्त भूत गण तथा सर्प गणों को भी संतुष्ट करता हुआ समस्त जगत को संतुष्ट करता है।
इस प्रकार गृहस्थ को चाहिए कि वह हव्य से देवताओं का, कव्य से मित्र गणों का तथा अन्न से अपने बंधुओं का सत्कार पूजन करें। यहां तक कहा गया है कि जो लोग देवता, ब्राह्मण, अग्नि और मित्रगण की पूजा करते हैं वह सब की अंतरात्मा में रहने वाले विष्णु की ही पूजा करते हैं।
ये यजन्ति पित्रन्, देवान्, ब्रहामणाश्च हुताशनान्।
सर्वभूतान्तरात्मानं विष्णुमेव यजन्ति ते।।-यमस्मृति
विभिन्न स्रोतों से साभार
-जगदीश जोशी

Copyright © शक्ति न्यूज़ | Newsphere by AF themes.