November 17, 2021

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अतीत से कैसे छुटे ताकि वर्तमान में जिया जा सके

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डॉ रमेश सिंह पाल, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक और लेखक है। डॉ पाल के शोध लेखपत्र विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। डॉ पाल वर्तमान में यूनेस्को समावेशी नीति लैब के विशेषज्ञ भी है।

अतीत के साथ दो काम करने हैं, जो संगृहीत अतीत है, उससे छूटना है। और जो संगृहीत हो सकता है, उसको संगृहीत नहीं होने देना है। पिछले संस्कार को पोंछना है और नए संस्कार को निर्मित नहीं होने देना है। तब ही केवल हम दर्पण की तरह स्वच्छ हो सकते है। उस दिन जगत जैसा है हमको वैसा ही दिखाई पड़ने लग जाएगा। और अगर ऐसी दर्पण जैसी स्थिति मिल जाए, तब जो हम जानते हैं, वह संसार नहीं है, वह परमात्मा है। तब जो हम जानते हैं, वह मूल है, उदगम है। उसे जानते ही जीवन के सारे दुख तिरोहित हो जाते हैं।इन दोनों बातों में विरोध नहीं है। एक है लक्ष्य, वर्तमान में जीना। और दूसरी है विधि, अतीत में छुटना, जिससे यह लक्ष्य पूरा हो सकता है। अतीत का अर्थ है, अनंत लीकीरे। हम कितनी ही बातें करे उनसे अक्सर बुद्धि सहमत हो जाती है, हम निर्णय ले लेते हैं; संकल्प कर लेते हैं। लेकिन घड़ी भी नहीं बीत पाती कि जो हमने निर्णय लिया था, वह टूट जाता है। और तब सिर्फ आत्मग्लानि पैदा होती है, और कुछ भी नहीं।लोग अपने अतीत को छोड़ने की अक्सर कसम खाते मिल जाते है। लेकिन कसमों से आदतें कभी छुटती नहीं। और कसमों से आदतें छूटती होतीं, तो सारी दुनिया कभी की बदल गई होती। लेकिन बुद्धि को यह बात ठीक लगती है, लेकिन मैं कहता हूँ की कसम खा लेना ही काफी नहीं है जीवन रूपांतरण के लिए। क्योंकि जीवन बुद्धि से ज्यादा गहरा है। वहा कई अचेतन परतें हैं। और बुद्धि की खबर वहा तक नहीं पहुंचती।

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