January 28, 2022

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जानिये— कुली बेगार अन्तिम कड़ी..

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13 जनवरी 1921 को मकर संक्रान्ति के दिन विभिन्न स्थानों से आये 15—20 हजार तक के जनसमूह कुली रजिस्टरों को सरयू में बहाकर बद्रीदत्त पाण्डे की जै—जै कार करने लगे और बागेश्वर से लौटकर जाने वाली जनता ने अपने—अपने क्षेत्रों, गांवो, कस्बों में जाकर इसका प्रचार किया और इस आन्दोलन ने इतना बड़ा रुप धारण कर लिया कि जनवरी 1921 से अप्रैल 1921 के अंतराल में कुमाऊं और गढ़वाल में अनेको बेगार विरोधी समाये हुई तथा अधिकारियों को कुली मिलने में कठिनाई होने लगी तथा 1921 के अंत तक इस अमानवीय और वर्षों से चली आ रही इस कुप्रथा का अंत हो गया।
शक्ति के संपादक बदरीदत्त पाण्डे के ​लेखों और समाचारों से कुपित होकर मई 1921 में शक्ति से 6 हजार रुपये की जमानत मांगी गई।
इस प्रकार शक्ति ने जनसाधारण को संगठित कर सामूहिक और खुले प्रतिरोध के लिये तैयार किया शक्ति ने अपने प्रारम्भिक अंकों से ही तीव्रता से कुली प्रथा का विरोध किया तथा शक्ति ने ही कुली विरोधी आन्दोलन को उग्र करने और अधिक से अधिक जनता को उसमें सम्मिलित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और इस प्रथा से जनता को मुक्ति दिलाई।

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