September 23, 2021

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जानिये इतिहास:— कुमाऊॅं में रामलीला और दशहरा

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वर्ष 1860से प्रारम्भ हुई कुमाऊॅंनी शैली की रामलीला का एक समृद्ध इतिहास है। इस शैली की रामलीला का मंचन पं0 देवीदत्त जोशी (मु0 मकीरी अल्मोड़ा निवासी) ने सबसे पहले 1830 में मुरादाबाद में करवाया था।
अल्मोड़ा में 1860 में रामलीला के मंचन का प्रारम्भ करवाने का श्रेय भी पं0 देवीदत्त जोशी को जाता है। पं0 देवीदत्त जोशी के प्रयास से गेय शैली की रामलीला का मंचन अल्मोड़ा के बद्रेश्वर मंदिर परिसर के मैदान में (जहां अब एक निजी अस्पताल खुल चुका है) प्रारम्भ होने के बाद पाटिया, छखाता, सतराली तथा भीमताल में भी हुआ। बागेश्वर में वर्ष 1890 में शिवलाल साह ने रामलीला करवाई।
अल्मोड़ा में इससे पूर्व राम जुलूस का आयोजन किया जाता था तब एक मात्र रावण का पुतला बनता था। जिसकी ऊंचाई 20 से 25 फीट तक होती थी। सन् 1900 से पूर्व अल्मोड़ा में एक मात्र रामलीला बद्रेश्वर में होती थी। तत्पश्चात् नन्दादेवी में रामलीला का आयोजन प्रारम्भ हुआ। बाद में नारायण तेवाड़ीदेवाल, पाण्डे खोला, चीनाखान, जाखनदेवी आदि स्थानों में रामलीला का आयोजन हुआ। मल्लीताल नैनीताल में वर्ष 1912 में रामलीला का मंचन प्रारम्भ हुआ। पिथौरागढ़ में रामलीला का प्रारम्भ 1897 में हुआ यहां रामलीला करवाने का श्रेय देवीदत्त जोशी डिप्टी कलेक्टर को ही जाता है। उन्हीं के प्रयासों से नैनीताल और हल्द्वानी में रामलीला मंचन प्रारम्भ हुआ।
कूर्मांचलदीप रामलीला ने हिन्दी रंगमंच के इतिहास तथा देश की प्रसिद्ध रामलीलाओं में अपनी मौलिकता कलात्मकता संगीत एवं रागरागिनियों ने निबद्ध होने के कारण अलग ही स्थान बनाया है। संगीत प्रधान गेय शैली की रामलीला की परम्परा अल्मोड़ा से ही चारों ओर फैली इस लिए कूर्मांचलीय रामलीला मूलत: अल्मोड़ा शैली की ही रामलीला मानी जाती है।
दशहरा महोत्सव
आज सांस्कृतिक नगर अल्मोड़ा दशहरा महोत्सव स्थानीय कलाकारों की श्रृजनशीलता और कलात्मक अभिव्यक्ति को उल्लास और निष्ठा से जीवंत बना देने का माध्यम बन जाने के कारण रचनाशील के सामूहिक प्रदर्शन का महापर्द बन गया है।
लगभग एक सौ पन्द्रह वर्ष की यात्रा पूरी करने के बाद अल्मोड़ा के दशहरा पर्व ने अत्यन्त भव्य एवम् कलात्मक पुतलों के प्रदर्शन के कारण देश के प्रसिद्ध उत्सवों में अपनी पहचान बना ली है। रावण का पुतला पहले बद्रेश्वर के पास ही जलता था।
अल्मोड़ा में दशहरे पर पुतले बनाने की परम्परा 1903 में मानी जाती है। पहले रावण का अकेला ही पुतला बनता था बाद में पुतलों की संख्या में विस्तार हुआ। प्रारम्भ के वर्षों में रावण का पुतला नन्दा देवी लाला बाजार में बनता था। जबकि मल्लीबाजार, जौहरी बाजार, में भी बीसवीं शताब्दी की शुरुआती दशकों में पुतले बनने लगे थे 1976 में मल्ली बाजार में मेघनाद के आर्कषक पुतले का निर्माण शुरु हुआ। 1977 में जौहरी बाजार में कुम्भकर्ण का भीमकाय पुतला बनाने और अगले वर्षों में लक्ष्मीभण्डार हुक्का क्लब में ताड़िका का पुतले की परम्परा ने जन्म​ लिया। सन् 1982 तक नगर में रावण परिवार के दर्जन भर पुतले बनते थे और इसी वर्ष यहा दशहारा कमेटी गठित हुई इससे पूर्व लालाबाजार दशहरा कमेटी (रजि0) बनी थी जिसके सदस्य स्व0 अमरनाथ वर्मा, स्व0 सोहन लाल अग्रवाल, स्सव0 जवाहरलाल साह, स्व0 केशवलाल साह आदि थे।
दशहरा कमेटी गठित होने के बाद धीरे—धीरे पुतलों के जुलूस ने महोत्सव का रुप ले लिया। इन पुतलों, की मुद्राओं से आक्रमकता और कू्रता प्रदर्शित करवाने में अल्मोड़ा के कलाकारों की कोई सानी नहीं है। रावण परिवार की प्रवृत्ति और आचरण के अनुरुप सुदृढ़ शरीर, रुप विन्यास, कलासज्जा और शारिरीक मुद्राओं को प्रदर्शित करते इस पुतलों की नगर परिक्रमा का दृश्य देखने के लिए देश विदेशी पर्यटकों की भारी भीड़ जुटती है।
अल्मोड़ा को सांस्कृतिक नगरी का पर्याय बनाने में दशहरा महोत्सव का बड़ा योगदान है रामलीला और दशहरा ने अल्मोड़ा का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत में कुमाऊं का मान बढ़ाया है।

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