September 23, 2021

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जानिये……… सिद्ध नौला के महासंत

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उत्तराखण्ड की पावन तपो भूमि में अनादि काल से महान संतो ने यहां कर यहां तपस्या की ऐसे ही संतों के बारे में पाठको को जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है इस क​ड़ी में पढ़िये महानसंत ऋद्धिगिरी के बारे में…..
मध्य हिमालय की गोद में स्थित कुमाऊं में भी महान संत आये और यहां के घने जंगलों में पहाड़ों में कुटिया बनाकर तपस्चर्या में निरत रहे। वर्तमान उत्तराखण्ड पौराणिक काल से केदारखण्ड तथा मानस खण्ड इन दो भागों में विभक्त था
हैहय वंशी कार्तवीर्य के वंशजों के शासन काल में आठवीं—सदी में आदि शंकरा चार्य उनकी राजधानी ज्योर्तिमठ में आये तथा बदरिकाश्रम में भारत के चार धामों में से एक धाम की स्थापना की।
चन्द्रवंशी राजाओं के कार्यकाल में अनेक संत महात्मा उतराखण्ड के कूर्मांचल आये उद्योत चन्द के शासन के समय महात्मा गोरखनाथ सम्प्रदाय के महाराजा नागनाथ आये। उन्हें उद्योचन्द ने अपना गुरु बनाया। चन्दों ने इन नाथ सम्प्रदाय के योगी महात्माओं के लिये मठ की व्यवस्था की। उद्योत चन्द (1678—1698) के गुरु एक पहुंचे सिद्ध थे। उनका नाम ऋ​द्धि गिरी था।
चंदो की राजधानी चंपावत से हटकर अल्मोड़ा नगरी में 1561 ई0 में बनी।
अल्मोड़ा नगर के दक्षिण भाग में एक नौला है इस नौले के पास ये सिद्ध महात्मा रहते थे तब से इस नौले को सिद्ध का नौला कहते हैं आज भी नौला सूखा पड़ने पर भी पानी से लबालब भरा रहता है। उद्योत चंद प्रतिदिन अपने महल से सायंकाल आते और इस सिद्ध पुरुष के सानिध्य का लाभ उठाते माघ के महीने कड़ाके की ठण्ड थी चारों ओर बर्फ गिर रही थी सायंकाल नित्य की भांति उद्योतचन्द ऋद्धिगिरी की कुटिया में पहुंचे देखा कि ऋ​द्धगिरी महात्मा नंगे धूनी के पास बैठे है उन्हें ख्याल आया महात्मा इस ठण्ड में नंगे बैठे है उन्होंने अपना कीमती शाल महात्मा के ऊपर डाल दिया महात्मा ने शाल उठाकर धधकती धूनी में फैंक दिया उद्योत चंद खिन्न हो गये रात भर उन्हें नीद नहीं आई। दूसरे दिन नित्य की भांति उद्योतचन्द सिद्ध की कुटिया में गये। ​सिद्ध हंसे और कहा कि अरे उदुवा रात नींद नहीं आयी कीमती चीज थी न ले जा अपना शाल वापस ले जा धूनी में चिमटा डाल कर शाल निकाल कर उसे उद्योतचंद की ओर फैंक दिया। कहा कि हम जैसे फकीरों को इसकी जरुरत नहीं जा तू अपनी चीज ले जा इस सिद्ध पुरुष ने ही उद्योत चंद के समय ही जागेश्वर में जीवित समाधि ली। कुछ समय उपरांत कुमाऊं के कुछ लोग गंगा स्नान के लिये हरिद्धार गये वहा ब्रहम कुण्ड में नहाते समय उन लोगों ने किसी का सिर कुण्ड के मध्यभाग से ऊपर निकलता देखा एक ने चेहरा पहचान लिया। चिल्लाया अरे ये तो ऋद्धिगिरी महाराज है इन्होंने तो जागेश्वर में जीवित समाधि ली थी आश्चर्य है कि यहां कैसे आये वास्तव में वे ऋद्धिगिरी थे हाथ के इशारे से उन्हें पास बुला रहे थे लोग निकट आये उन्होंने अपनी अंगूली से सोने की अंगूठी निकाली और कहा अल्मोड़ा लौटने पर इसे उद्योतचंद को दे देना महात्मा को दी हुई अंगूठी वे पहचान गये आश्चर्य हुआ जागेश्वर में समाधि खुदवाई वहा भी अवशेष नहीं मिले तब से इस नौले का नाम सिद्ध का नौला पड़ा।

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