October 11, 2021

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नैनीताल के निर्माता श्री मोती राम शाह “

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इतिहासकार पण्डित नित्यानन्द मिश्र जी की डायरी से।
वर्तमान नयनी तड़ाग ( नैनीताल ) त्रिॠषि सरोवर के नाम से प्रसिद्ध रहा।( मानस खण्ड का 41वाँ अध्याय )
इसी गहन अरण्य प्रान्त में इस सरोवर के उत्तर की ओर श्री माँ का छोटा सा मंदिर था। जिसका वर्णन मानस खण्ड के 51 वे अध्याय में इस प्रकार है
ॠषिहृदोर्ध्वभागे वै महेन्द्रपरमेश्वरी।
राजते मुनिशार्दूला महारण्ये महेश्वरी ।।
इस गहन अरण्य प्रान्त में कत्यूरी एवं चन्द राजाओं के काल में आस- पास के ॻामवासी दिन के समय आते थे।मन्दिर से दूर तल्लीताल के पास दर्शनघर से दर्शन कर चले जाते थे। सम्पूर्ण अरण्य प्रान्त हिंसक जन्तुओं से भरा रहता था।
1816 में कूर्माचल प्रान्त अंग्रेजों के अधिकार में आया। मिस्टर ट्रेल कुमाऊँ के कमिश्नर बने। लगभग तेईस – चौबीस वर्ष तक अल्मोड़ा ब्रिटिश अमलदारी का केंद्र बना रहा। मिस्टर ट्रेल को नैनीताल के बारे में पता था पर वे नहीं चाहते थे कि विदेशी लोग यहाँ आकर रहें क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं कूर्माचल की जनता विदेशियों के पदार्पण का विरोध न कर दे। 1839 के लगभग शाहजहाँपुर रौजा रम फैक्ट्री के प्रबंधक पी. बैरन ने अपने सम्बन्धी श्री जेम्स बेटन , सहायक कमिश्नर कुमाऊँ के साथ नैनीताल की खोज की। सुन्दर सरोवर, अनुपम नैसर्गिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्यवर्धक जलवायु ने अंग्रेज अधिकारियों को इतना आकर्षित किया कि उन्होंने एक सुंदर नगर के निर्माण की योजना बना डाली और कुमाऊँ के दूसरे कमिश्नर मि. ल्यूसिंग्टन को नगर निर्माण का भार सौंपा गया। पी. बैरन ने 1839 में इस सरोवर की खोज का पता कलकत्ता के अंग्रेजी अखबार ” इंग्लिशमैन ” के आगरा संस्करण में दिया। 1842 में सारे की अंग्रेजों की ओर से एक पैमाइश ( सर्वे ) हुई। सारी घाटी के दौरान अलग – अलग प्लाट्स बनाये गये।
मल्लीताल में बाजार बनाने के लिए भी पैमाइश हुई।इन प्लाटों की कीमत बारह आना प्रति एकड़ रखी गई। दिसम्बर 1842 में पी. बैरन कैप्टन व्हेलर के साथ नैनीताल वापस आए।उस समय वे अपने साथ एक बीस फुट लम्बी नाव भी लाए। कहा जाता है कि उस समय सम्पूर्ण नैनीताल का इलाका नर सिंह थोकदार के अधीन था।उनसे पी. बैरन और कैप्टन व्हेलर ननाव में बैठने के लिए कहा, साथ ही नरसिंह थोकदार से यह भी कहा कि वह इस क्षेत्र का अधिकार अंग्रेजों को सौंप दे अन्यथा उन्हें तालाब में फैंक दिया जाएगा। डर के मारे थोकदार ने अपना अधिकार त्याग दिया। नरसिंह थोकदार के पुत्र ठाकुर त्रिलोक सिंह थोकदार थे । इनके वंशज अभी भी ज्योलीकोट में रहते हैं।
1844 में मि. ल्यूसिग्टन ने नैनीताल में बारह बंगलों के निर्माण की योजना बनाई और उस समय के प्रसिद्ध व्यक्ति श्री मोती राम शाह को इनके निर्माण का ठेका दिया गया। श्री मोती राम शाह जी ने हवालबाग ( अल्मोड़ा ) में कमिश्नर ल्यूसिंग्टन के आदेश पर अंग्रेज अधिकारियों के लिए कोठियाँ बनाई उस समय वर्तमान अल्मोड़ा के बजाय हवालबाग में अंग्रेज अधिकारी रहते थे। मोती राम शाह जी की सूझ – बूझ इतनी थी कि आज भी अल्मोड़ा नगरी में बुजुर्ग यह कहते हैं कि ” गुजीक मोती सुजीक बुधीक ” । गुजी शाह का लड़का मेधावी और बुद्धिमान है।
सिगौली की सन्धि के बाद 25 -26 वर्ष में पिता – पुत्र के अंग्रेजों के साथ मधुर संबंध स्थापित हो गए। अल्मोड़ा और हवालबाग में कई निर्माण कार्यों का भार इन्हें दिया गया। 1839 में जब अंग्रेजों ने नैनीताल की खोज की तथा नगर निर्माण की योजना बनाई तो इसका सम्पूर्ण भार मोती राम शाह जी को दिया गया। इस कारण इनको नैनीताल के निर्माता कहा गया।
ये मोती राम शाह जी वही व्यक्ति थे जिन्होंने अल्मोड़ा में वर्तमान टैक्सी स्टैंड के सामने ‘ श्री शाह भैरव मन्दिर ‘ बनाया तथा इसी मंदिर के नजदीक एक धारे का निर्माण किया जिसको बुजुर्ग लोग आज भी ‘मोतिया धारा’ कहते हैं।
प्रस्तुति — प्रकाश चन्द्र पन्त
सम्पादक — ‘अल्मोड़ा टाइम्स’
अल्मोड़ा

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