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गरीब असहाय लोगों की मदद करती जनपद पुलिस

अपनी अस्मिता को बचाए हुए है द्वाराहाट का स्याल्दे बिखोती कौतिक

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-उदय किरौला
कुभ मेले की अथाह भीड़ तथा राजनैतिक नेताओं की चुनाव सभाओं की भीड़ को देखते हुए इस बार द्वाराहाट क्षेत्र के लोगों ने भी कोरोना काल में ऐतिहासिक स्याल्दे बिखोती कौतिक की अस्मिता को बचाने का निर्णण लिया। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए स्याल्दे बिखोती मेला कमेटी तथा नगर पंचायत द्वाराहाट ने केवल पारंपरिक नगाड़ा टीमों को मेले में आने की स्वीकृती दी। मेले में लगने वाले चर्खे आदि तथा बाहरी व्यापारियों को भी मेला कमेटी ने आने की सहमति नहीं दी। इस बार मेले में बाहरी सांस्कृतिक टीमों के साथ ही स्थानीय स्कूलों के बच्चों के भी कार्यक्रम नहीं हुए। परंतु 13,14 तथा 15 अप्रैल को यह मेला बहुत ही सादगी के साथ इस बार संपन्न हुआ।
जहां स्थानीय मेलों का अस्तित्व खतरे में है। वहीं इस वर्ष स्याल्दे बिखोती मेले के पहले दिन 13 अप्रैल की रात 8 गांवों के लोग अपने गांव के नगाड़े,छोलिया नृत्य,झोड़े तथा भगनौल गाते हुए मेले में पहुंचें। मेले के दूसरे दिन 14 अप्रैल को नौज्यूला धड़े के 4 गांवों के लोग मेले में पहुंचे। 15 अप्रैल को मुख्य मेले के दिन गरख धड़े के 10 गांवों के लोग तथा आल धड़े के 1 गांव के लोग अपने-अपने गांव के नगाड़े सहित मेले में पहुंचे। समूचे मेले में 23 गांवों के लोग अपने खर्चे पर मेले में नगाड़ों के साथ पहुंचे। एक गांव से नगाड़ा ले जाने के लिए नगाड़ा और दमुवा बजाने वाले दो कलाकार, रणसिंग बजाने वाला एक कलाकार, सरंकार(छोलिया नृत्य) वाले दो कलाकार, निसाण(ध्वजा) ले जाने के लिए दो व्यक्तियों सहित 7 कलाकारों की व्यवस्था करने में लगभग दस हजार से 15 हजार रुपए तक का खर्च आता है। जिसे ग्रामीण स्वयं वहन करते हैं। चर्चा होती है कि गांव से नगाड़ा ले जाने के लिए मेला कमेटी यानी सरकार से पैसा मिलता है इसलिए लोग अपने गांव का नगाड़ा लाते हैं। इस संदर्भ में नगर पंचायत द्वाराहाट के अध्यक्ष श्री मुकुल साह जी से हुई वार्ता के अनुसार मेले के लिए लगभग एक लाख रुपए शासन से मिलता है जिसका 60 प्रतिशत नगाड़े लाने वाले गांवों को दिया जाता है। उनके अनुसार मेले में जितने गांवों के लोग नगाड़े के साथ पहुंचते हैं उन्हें यह धनराशि बराबर-बराबर बांटी जाती है। यह धनराशि लगभग दो या ढाई हजार के लगभग होती है। यह धनराशि भी सरकार के बजट आने पर ही मिल पाती है। इस प्रकार गांवों के लोग सरकार के भरोसे पर नहीं अपने संसाधनों से मेले में नगाड़ा ले जाते हैं। गांव के लोगों का मानना है कि यह धनराशि खर्चे के बतौर मिलने के बजाय सम्मान के तौर पर मिलती तो गांव वालों का और अधिक उत्साह बढ़ता।
इस मेले में नगाड़ा ले जाने के लिए कुछ गांव होली की बचत को खर्च करते हैं तो कुछ गांव अपने गांव के फंड से स्याल्दे मेले के लिए खर्च करते हैं। किसी गांव में मेले में नगाड़ा ले जाने के गांव के लोग चादर में अपनी श्रद्धा से पैसा जमा करवाते हैं, बांकी जितनी धनराशि और खर्च होती है उसे गांव के कुछ उत्साही लोग आपस में मिलकर जमा करते हैं। किसी गांव में नगाड़ा ले जाने के लिए लोग प्रत्येक परिवार से चंदा जमा करते हैं। कुछ गांव में कुछ सक्षम लोग ही आपस में मिलकर धनराशि जमा करते हैं। किसी गांव में अभी भी पुराने थोकदार और पधानों के घर से नगाड़ा उठाया जाता है तो किसी गांव में वर्तमान पंचायती व्यवस्था में निर्वाचित ग्राम प्रधान नगाड़ा ले जाने की व्यवस्था करते हैं।
अलग-अलग कारणों से गांवों के लोगों ने अपने पारंपरिक काम छोड़ दिए हैं। इस कारण अब गांवों में नगाड़ा व रणसिंग बजाने वाले तथा छोलिया नृत्य करने वाले पारंपरिक प्रशिक्षित कलाकार नहीं मिल पाते हैं। दूरस्थ गांवों से अधिक मानदेय देने पर भी कलाकार नहीं मिल पाते हैं। समय के साथ पारंपरिक व्यवसाय,रीति रिवाज तथा संस्कृति में बदलाव आ रहा है। नगाड़ा बजाने वाले प्रशिक्षित कलाकार न मिलने पर गांव के पढ़े-लिखे युवा अपने गले में नगाड़ा व दमुवा लेकर अपने गांव का नगाड़ा स्वयं ले जा रहे हैं। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए ये सकारात्मक पक्ष है। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति व दूसरे कारणों से युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूरी बना रही है। इस नकारात्मक पक्ष पर भी विचार किया जाना जरूरी है। एक गांव के पधान के अनुसार अब गांव का जनप्रतिनिधि चयनित ग्राम प्रधान गांव का मुखिया है। तमान सरकारी लेन देन उसके माध्यम से होता है। केवल मेले तक ही उनकी पधानचारी रह गई है। उनके अनुसार गांव के लोग मेले के लिए पैसा भी जमा करते हैं। नगाड़ा बजाने के लिए प्रशिक्षित कलाकार दूसरे गांव के होते हैं। ये प्रशिक्षित कलाकार मेले की समाप्ति तक अपने काम को पूरी ईमानदारी से करते हैं। परंतु मेले की समाप्ति पर नगारा आदि गांव वापस गांव लाने के लिए लोग तैयार नहीं रहते हैं। पूरी जिम्मेदारी पधान के हिस्से होती है। ऐसे में स्याल्दे बिखोती में उनके गांव से पिछले कई वर्षो से नगाड़ा नहीं जा रहा है। परंतु कई गांवों में अब चयनित ग्राम प्रधान के नेतृत्व में नगाड़ा जा रहा है। जहां कई गांवों का नगाड़ा मेले में नहीं जा रहा है। वहीं कई ग्राम पंचायतों में अलग-अलग तोकों से युवा अपने गांव का नगाड़ा ले जा रहे हैं। इस साल स्याल्दे मेले में विद्यापुर गांव का नगाड़ा 40 साल व गवाड़ गांव का नगाड़ा 15 साल बाद युवाओं की पहल पर मेले में शामिल हुआ। कहते हैं कि घर में किसी की मृत्यु के बाद एक साल तक बाजा नहीं बजता। बताते हैं कि यहां एक गांव में पधान जी के पिताजी की मृत्यु हो गई। स्याल्दे के दिन ही उनका पीपलपानी थी। पधान जी सुबह जल्दी पीपलपानी के बाद अपने गांव का नगाड़ा लेकर मेले में गए। ये कहीं न कहीं अपने गांव की पहचान बनाने व अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास ही तो है।
आल समूह से इस बार केवल एक गांव का नगाड़ा शामिल हुआ। बताया गया कि मेला कमेटी से सीधे संवाद नहीं होने के कारण कई गांवों के लोग मेले में शामिल नहीं हुए। एक गांव के प्रधान के अुनसार समूचे मेले की शोभा विभिन्न गांवों से आए नगाड़ों के कारण होती है। परंतु गांववालों तक मेला कमेटी का सीधे संवाद तक नहीं होता है। लोगों का कहना है कि मेला कमेटी में केवल बाजार के नजदीक के लोगों को शामिल किया गया है। मेले से पहले मेला कमेटी में नगाड़े ले जाने वाले गांवों के प्रधान या सभापति को आमंत्रित कर जहां मेले में उनकी सक्रिय भागीदारी होगी वहीं संवादहीनता भी नहीं होगी।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद हमारी सरकारें अपना राजस्व बढ़ाने के लिए स्थान-स्थान पर शराब की दुकानें खोल रही हैं। ये तो सभी जानते हैं। इस बार स्याल्दे मेले में द्वाराहाट में शराब की दुकानें खुली रही। सरकार के राजस्व बढ़ाने के इस अभियान में गांव खोखले होते जा रहे हैं। ऊपर जिन प्रशिक्षित कलाकारों की बात कहीं गई हैं। उनमें से कुछ तो सुबह से ही अपना मनोरंजन पहले ही कर लेते हैं। गांववाले उनका मनोरंजन कर अपने को बड़ा सिद्ध करना चाहते हैं। परंतु उनकी इस पहल से उनके गांव क्या पूरे मेले की बदनामी होती है।
परंपरा के अनुसार द्वाराहाट के गांवों में चैत्र एक गते यानी फूल संक्रांति के दिन से झोड़े प्रांरभ हो जाते हैं। पूरे चैत्र माह में गांवों में रात को झोड़े होते हैं। गांव के लोक कलाकार विगत एक साल में हुए सामाजिक विसंगति, प्रेम प्रसंग आदि समसामयिक मुद्दों पर झोड़े तैयार करते हैं। गांवों से निकलकर मुख्य मेले के दिन ये झोड़े सार्वजनिक हो जाते हैं। ये झोड़े एक गांव से दूसरे गांव तथा दूसरे क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। प्रेम प्रसंग का कोई झोड़ा एक गांव से दूसरे गांव में गाया जाने लगा और उस गांव में उस प्रेमी और प्रेमिका का कोई रितेदार होता है तब कई बार गांव में झगड़ा होने की संभावना भी बन जाती है। गांवों में बढ़ती पानी की समस्या,शराब के प्रचलन,जंगलों में आग लगने व कोरोना की वजह से नौकरी जाने पर आधारित ये झोड़ा इस वर्ष मेले में छाया रहा :-
गौनूं में हैगे पाणि की पटा,शराब धकाधक,
धुर जंगला आग लागिगो,सैपूं की चकाचक,
कोरोना त्वीलै नौकरी खाई,नेता ज्यू टकाटक।
द्वाराहाट में राजनैतिक व्यंग्य बतौर झोड़ा भी इस बार गाया गया ‘काईखोई हैरौ खालि बदनाम,नैपाला हैरौ भौ, अधिला साला पंदरा पैटा हिटणी ल्यायै भौ’। शराब तथा बंदर और जंगली जानवरों के आतंक से संबंधित झोड़ों के साथ कई पुराने झोड़े भी सुनने को मिले। गांव के नगाड़ों के साथ ही गांव की महिलाएं भी घरों से निकलती है। इस बार बाहर की दुकानें नहीं थी, और मीना बाजार भी नहीं लगा। इस कारण इस बार मुख्य मार्ग में कई स्थानों पर गांव की महिलाओं ने अलग-अलग समूहों में झोड़े गाए। मुख्य मेला स्थल पर भी महिलाओं ने बड़े समूह में झोड़े गाए।
मेले में नौज्यूला, गरख और आल समूह के नगाड़ों के साथ तीन चार समूहों में अलग-अलग गीतों
के साथ टोलियां रहती हैं। इन टोलियों में भगनौल गायक बीच-बीच में जोड़ मारते हैं। उस जोड़ के साथ मेले में शामिल लोग नाच करते हुए अलग-अलग गीत गाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेले में इन पंक्तियों के लेखक की भागीदारी लगभग हर वर्ष तीन दिन तक हुड़के के साथ रहती है। बड़ी भीड़ के साथ कभी-कभी तो गीत के बोल तक नहीं सुनाई देते हैं। कई समूह में युवाओं को अश्लील गीत गाते हुए भी सुना गया। इनमें से कई तो घुटुक-घाटुक लगाकर मस्त थे। उन्हें किसी गीत से कुछ लेना-देना नहीं था। मेला व्यवस्थित हो इस पर भी मेला कमेटी तथा गांवों के लोगों का आपस में विचार विमर्श करना चाहिए। मेले में ओड़ा भेंटते समय भी सारे निषाण एक साथ चलें तो लोग उस धड़े के सारे गांवों की गिनती कर सकें। इधर कई वर्षो से अलग-अलग गांवों के युवा अति उत्साह में अपने निसाण पहले लेकर अलग हो जाते हैं। इससे नगाड़ों या निसाणों की गिनती तक नहीं हो पाती। इसके लिए मेला समिति को सभी गांवों के थोकदार/पधानों/सभापतियों की एक बैठक जरूर बुलानी चाहिए।
ज्ञातव्य है कि कालांतर में देश के अन्य शिवालयों व तीर्थो की तरह द्वाराहाट के स्थानीय तीर्थ श्री विभांडेश्वर महादेव में भी लोग विषुवत संक्रांति यानी बिखोती के दिन स्नान व पूर्जा अर्जन के लिए आते थे। जन श्रुति के अनुसार एक बार बिखोती में द्वाराहाट में हुए एक झगड़े में द्वाराहाट के लोगों ने किसी बाहरी गांव के थोकदार को मार कर उसका सिर जमीन में गाड़ दिया। वहां पर एक पत्थर गाड़ दिया गया। जिसे ‘ओड़ा’ कहा जाता है। तब से स्याल्दे मेले के दिन द्वाराहाट क्षेत्र के लोग नगाड़े, निसाण, छोलिया नृत्य, गीत भगनौल गाते हुए मेले में आते हैं। मेलार्थी उस पत्थर यानी ओड़े के ऊपर लकड़ी मारकर अपनी वीरता व विजय को याद करते हैं। कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन काल में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए समूचे क्षेत्र की जनता को आल गरख व नौज्यूला धड़े में बांट दिया गया। तब से तीनों समूहों अपनी बारी के अनुसार ओड़ा भेटने की रस्म अदा करते हैं।
एक किस्सा प्रचलन में है कि दोर्याल (द्वाराहाट निवासी) अपना बैल बेचकर भी स्याल्दे बिखोती मेला जरूर जाता है। परंतु इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के वर्तमान दौर में बेरोजगारी, महंगाई, शराब के प्रचलन,युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति व मेलों में होती गुंडागर्दी के कारण अब मेले व दूसरे सार्वजनिक समारोह आयोजित करना अपने आप में एक चुनौती है। इस बार कुंभ मेले तथा सल्ट विधानसभा चुनाव में पुलिस की तैनाती के कारण पुलिस की समुचित व्यवस्था नहीं थी। उसके बावजूद गांवों की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था ने मेले को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न करवाने में मदद की। एक दौर था जब देश प्रदेश में रह रहे प्रवासी इस मेले में छुट्टी लेकर आते थे। परंतु महंगाई, बेरोजगारी व अन्य कारणों से चाहते हुए भी लोग मेले में नहीं आ पाते हैं। उसके बावजूद जागरूक युवाओं की पहल पर द्वाराहाट का स्याल्दे बिखोती मेला आज भी अपने स्वरूप व अस्मिता को बचाए हुए है।
– उदय किरौला संपादक बालप्रहरी, दरबारीनगर,अल्मोड़ा, उत्तराखंड –

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