January 24, 2022

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उत्तराखण्ड के संत हैड़ाखण्डी बाबा

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हैड़ाखान गांव हल्द्वानी से लगभग 20 किमी दूर गौतम गंगा के तट पर स्थित है। हरेनाम की औषधि बहुतायत से होने के कारण इस क्षेत्र को हैड़िया खान कहा जाता है। यहां रहने वाले परमपूज्य शांत सदाशिव को हैड़ियाखान के नाम से जाना जाता है। यहां पर संत ने शिवालय बनवाये सबसे पहले उन्होंने सर्वसाधारण को वहां एक दिव्य गुफा में दर्शन दिये वे अदभुत वे योग संपदाओं से परिपूर्ण थे वे शरीर से ही नहीं वरन् मन ​बुद्धि से विलक्षण और प्रतिभावान थे। वे पुरात्न संस्कृति के अनुकूल वस्त्र धारण करते थे। वे जब भी हवन करते थे घी के स्थान पर जल की आहुति देते थे। वे कभी—कभी अपने शरीर में लगे महाभारत के घाव दिखलाते थे इससे इनकी दीर्घायु का पता चलता है। वे बाल ब्रहमचारी थे मठ्ठा ही उनका भोजन था कहते है कि इनकी इच्छा से ईश्वरी उपासना का मार्ग बनने हेतु एक मन्दिर का निर्माण स्वत: ही होने लगा यह अष्ट कोण मन्दिर था यही हैड़खान महाराज अपने दृश्य मात्र से भक्तजनों के मनोरथ पूर्ण करते थे इनकी पंचामी तपस्या बड़ी विलक्षण थी। बैशाख माह में ये थोड़ी—थोड़ी दूरी पर ढेरों लकड़िया व कण्डों का ढ़ेर करके उसके बीच विराजमान हो जाते थे और इनके तप से लकड़ियां व कण्डे स्वयं जल जाते थे उस समय इनके शरीर में एक पतली चादर रहती थी तपस्या कई दिन तक चलती रहती थी। भक्तजन यह समझते थे उनका शरीर आग में भस्म हो जायेगा परंतु ​अग्नि के समाप्त होने पर इनका शरीर सूर्य के समान चमकता था जब ये अपने शरीर से चादर हाटाते थे तो उसमें से जल टपकता था। एक बार हैड़ाखान बाबा बदरीनाथ जाकर एक चबूतरे में बैठ गये मन्दिर का पुजारी उन्हें प्रसाद देने आया परंतु बाबा नेत्र बंद करके बैठे रहे और प्रसाद ग्रहण नहीं किया जिस प्रसाद के लिये भक्तगण प्रतीक्षा करते हैं। तब श्री लक्ष्मी जी स्वयं थाल में भोजन लेकर आयी तभी उन्होंने प्रसाद पाया।
हैड़ाखान बाबा के कुमाऊं से अंर्तध्यान होने की दिलचस्प किम्बदन्ती है। अंर्तध्यान होने से बाबा ने कठघरिया में एक बावड़ी बनवाली कठघरिया से बाबा अस्कोट आये जहां वे अस्कोट के राजा खड़क सिंह ने उन्हें अपने यहां बड़ी प्रसन्नता से अपने महल में विश्राम कराया कुछ समय बाद बाबा ने नैपाल जाने की इच्छा प्रगट की तथा राजा ने उन्हें डोली में स्वयं कघा लगाकर सीमा की हद तक परिजनों और सेवकों के साथ सम्मान से विदा किया बाबा अस्कोट से तीन मील तक काली नदी के तट तक गये जल के अथाह वेग में आप नैपाल की ओर मुंह करके विराजमान थे और कुछ ही क्षणों में अंर्तध्यान हो गये। तब से कुमाऊं में आपके दर्शन नहीं हुये। सोमवारी बाबा तथा हैड़ियाखान बाबा शक्ति सम्पन्ना सिद्ध साधक थे।

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