October 13, 2021

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शेरदा अनपढ़ होते, कोरोना से पूछते, को छै तू ? कुमाऊंनी कवि की आठवीं पुण्यतिथि आज देखें वीडियो——–

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जगदीश जोशी वरिष्ठ पत्रकार नैनीताल: कुमाऊंनी कविता को आधुनिक दौर में ऊंचाई तक पहुंचाने में शेरदा अनपढ़ (शेर सिंह बिष्ट) का अहम योगदान है। उनकी कविताओं में जमाने का यथार्थ है। वहीं सही मायने में खुद का भोगा सत्य भी शामिल हैं। कोरोना के काल में यदि शेरदा आज जिंदा होते तो शायद यही पूछते ‘को छै तू ?’। अल्मोड़ा के माल गांव में 3 अक्टूबर 1933 जन्मे शेरदा अनपढ़ ने 20 मई 2012 को आज के दिन दुनिया से अलविदा कहा था। आज के माहौल में जब हम शेरदा की याद करते हैं तो लगता है कि आज होते तो वे जरूर कुछ नया रचते। शायद कोरोना से ही पूछते ‘को छै तू’। शेरदा की बखता त्यर बले ल्यूं ‘ के अलावा ‘को छै तू’ कविता को काफी सराहा गया। उन्होंने इसको अपनी सबसे पसंदीदा रचना भी बताया।

नवीन बिष्ट

माल गांव के ही निकट अल्मोड़ा शहर से लगे सरसौं गांव निवासी कुमाऊंनी कविता के सशक्त हक्ताक्षर वरिष्ठ पत्रकार नवीन बिष्ट शेरदा को याद करते हुए कहते हैं कि उनकी रचनाओं का संसार विविध है। विनोद, हास्य व व्यंग से परिपूर्ण कविताएं आध्यत्म व दर्शन की मानो पराकाष्ठा हैं। इनमें खुद भोगा हुआ जीवन का यथार्थ शामिल है। शेरदा की कई रचनाएं ऐसी हैं कि गुणीजनों को ध्यानस्थ अवस्था तक पहुंचा दे। को छै तू इनमें से एक है। उनका कहना है कि कुमाऊंनी साहित्य के लिए शेर दा के योगदान को जीते जी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। प्रदेश सरकार से आज भी यह अपेक्षा है।

अनिल घिल्डियाल

भारत सरकार के गीत एवं नाट्य प्रभाग नैनीताल में उनके साथी रहे वरिष्ठ कलाकार अनिल घिल्डियाल के लिए शेरदा एक अभिभाक थे वहीं सखा भी थे। अनिल याद करते हैं कि संस्थान में इंटरव्यू के दिन से ही न जाने क्यों शेरदा का उनसे लगाव रहा। उनकी कविता की प्रस्तुति गजब की थी, भाषा बोली नहीं जानने वाले दर्शक भी ताली बजाने को मजबूर हो जाते थे। लगता था कि उनकी भाव भंगिमा कविता बयां कर करी हो। अनुशासन प्रिय शेरदा ने ‘ओ परुवा बौज्यू चपल के ल्या छा यस’ के अलावा कई पहाड़ी गाने लिखे। नाटक में कई किरदार निभाए। नाट्य प्रभाग के लाईट एंड साउंड कार्यक्रम मंजिल और भी हैं में उन्होंने गांधी जी का यादगार रोल अदा किया था। निदेशक प्रेम मटियानी ने इसके देश मे कई शो कराए थे। अनिल का कहना था, प्रसिद्धि के बाद भी हम जैसे साथी कलाकारों के लिए शेरदा के प्रेम व प्यार में कोई अंतर नहीं रही। ऐसे सरल इंसान बहुत कम होते हैं।

बेटे आनंद के साथ शेरदा

शेरदा रिटायर होने के बाद हल्द्वानी आ बसे थे। उनके बेटे आनंद बिष्ट व बहू शर्मिष्ठा भी कलाकार हैं। आनंद का कहना है उन्हें गीत संगीत का वातावरण विरासत में मिला। पिता जी ने लेखन में समर्पित रहे। सुबह उठ कर घर से दूर एकांत में पेड़ के नीचे बैठ कर लिखना उनकी दिनचर्या में शुमार था। अनुशासन का पूरा ख्याल रखते थे। जिम्मेदारी को समर्पणभाव से पूरा करने की उनकी आदत रही। यह सब हमारे लिए प्रेरणादायक रहा। ?पिताजी कुमाऊंनी में नई पीढ़ी के लेखन के प्रति आशावान थे। अपने कई साक्षात्कार में वह कहा करते थे कि अनपढ़ होते हुए जब उन्होंने लिखा है तो पढ़े लिखे बेहतर लिखेंगे। परिजनों ने शेरदा की पुण्य तिथि पर कोलाज भी तैयार किया है।

दीपक जोशी

नानन बटिक ठुलन तक उनार् सबै दोस्त छि: दीपक जोशी* कुमाऊँनि भाषाक पुरोधा कवि शेर सिंह बिष्ट उर्फ ‘शेर् दा अनपढ़’ एक मैंस नि है बेर आपुण आप में एक पुरि संस्था छिं, उनार् बार् में जतुक लै कफ़ई जौ उतुक कम छु। आपुणि नौकरीक दौरान मकैं उनन कैं काफि नज़दीक बटि देखणौक और सुणनौंक मौक मिलौ, मैंल देखौ कि उंँ एक बेहद शरीफ और तमीज वाल् आदिम छिं, नानन बटिक ठुलन तक उनार् सबै दोस्त छि और हर उमराक लोग उनरि कवितान कैं सुणनाक लिजि लालायित रूँछिं और खूब आनन्द ल्हिंछि।
‘शेर् दा’ गज़बाक कलाकार हुँणाक साथ-साथ हास्य-व्यंगैकि कवितानाक सिरमौर छिं, उनल न केवल हास्य बल्कि गम्भीर विषयन में लै उच्चकोटिक रचना करिं, जननकैं सबै जाग बौहौत पसन्द करिगो और सराहिगो। गीत एवं नाट्य प्रभाग में काम करणाक कारण शेर्दाक अधिकांश जीवन नैनताल मेंई बितौ और नैनताल कैं उँ पसन्द लै बहौत करन छिं, जैक बार् में उनल अनेक विषयन में कई हास्य-व्यंग्यकि कविता लै लेखिं। नैनतालाक १५० साल हुणमें उनल एक कविता लेखि जैकि शुरूकि चार पंक्तिन में व्यंग छु :
“हाय-हाय रे नैनीताल, हैगयीं १५० साल।
डेड़ सौ साल पैलि याँ को रूँछि काव,
तलताल बानर से रूँछि, मलताल श्याव।
इथकै घुरड़- काँकड़ रूँछि, उथकै भालू-शेर,
बीस-पच्चीसेक खबीश फैरुँछि यो खाव भितेर।”
आपुँकैं अनपढ़ लेखणाक उपर उनरि हास्य-व्यंग्यैकि एक कविता छि :
“मैं भयूँ काँसि पितौवक फरु, तुम सुनुक ब्याल् भया।
मैं अनपढ़, अनपढ़ै रयूँ, तुम लिख पड़ि गुणिक च्याल भया।”
शेर् दाकि पुण्य तिथि में उननकैं याद करते हुए मैं श्रद्धान्जलि अर्पित करुँ। (*दीपक जोशी अवकाश प्राप्त उप निदेश सूचना हैं)

कुमाऊंनी कविता को आधुनिक दौर में ऊंचाई तक पहुंचाने में शेरदा अनपढ़
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