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बसंत पंचमी एक प्रमुख हिन्दू त्यौहार है। यह पर्व ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित है। इस दिन देवी भगवती सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पर्व हर वर्ष माघ शुल्क पंचमी को मनाया जाता है। बंसत पंचमी ज्ञान की देवी मां सरस्वती की पूजा का दिन है इसलिए इसे सरस्वती पूजन के नाम से भी जाना जाता है। इस उत्सव को मनाने के पीछे का उद्देश्य यह है कि मां सरस्वती विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी है। सृष्टि काल में ईश्वर की इच्छा से आद्या शक्ति ने अपने को पांच भागों में विभक्त कर लिया था। वे राधा, पार्वती, सावित्री, दुर्गा और सरस्वती के रूप में भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थी। उस समय श्री कृष्ण के कंठ से उत्पन्न होने वाली देवी का नाम सरस्वती हुआ। इनके और भी नाम हैं जिनमें वाक्, वाणी, गी, गिरा, भाषा, शारदा, वाचा, श्रीश्वरी, बागीश्वरी, ब्राह्मी, गौ, वाग्देवी आदि प्रसिद्ध है। ऋग्वेद के अनुसार वाग्देवी सौम्य गुणों की दात्री और सभी देवों की रक्षिका हैं। सृष्टि निर्माण भी वाग्देवी का कार्य है वे सारे संसार की निर्मात्री एवं अधीश्वरी है। वाग्देवी को प्रसन्न कर लेने पर मनुष्य संसार के सारे सुख भोगता है। इनके अनुग्रह से मनुष्य ज्ञानी, विज्ञानी, मेधावी, महर्षि और ​ब्रह्मर्षि हो जाता है।
बसंत पंचमी के साथ बसंत ऋतु का आमगन भी होता है। शिक्षण संस्थानों में सरस्वती की पूजा अर्चना की जाती है। सरस्वती पूजन से संबधित प्रचलित पौराणिक कथा के अनुसार संसार की रचना के समय भगवान विष्णु की आज्ञा पाकर ब्रहा जी ने अन्य जीवों समेत मनुष्य की भी रचना की थी। कहते हैं कि ब्रहा जी इससे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें ऐसा लग रहा था मानो कुछ कमी रह गयी है। जिससे चारों ओर शांति का वातावरण है इसके उपरांत ब्रह्मा जी ने विष्णु भगवान से अनु​मति लेकर अपने कमण्डल से जल का​ छिड़काव किया। ऐसा करते ही पृथ्वी पर कंपन होने लगी। तभी पेड़ों के बीच से एक देवी प्रकट हुई उसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। जबकि बाकी दूसरे हाथों में पुस्तक और मोतियों की माला थी। उन्हें देख कर ब्रह्मा जी ने उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा बजाना शुरू किया तभी संसार के प्राणियों में बोलने की क्षमता का विकास हो गया। समुद्र कोलाहल करने लगा, हवा में सरसराहट होने लगी यह देख कर ब्रह्मा जी ने उस देवी का नाम वाणी की देवी का नाम दिया।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीमननारायण ने बाल्मिकी को सरस्वती का मंत्र बतलाया था जिसके जप से उनमें ​​​कवित्व शक्ति उत्पन्न हुई थी। म​हर्षि बाल्मिकी, व्यास, व​शिष्ठ, ​विश्वामित्र तथा शौनक जैसे ऋषि इनकी ही साधना से कृतार्थ हुये। सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए विश्वविजय नामक सरस्वती कवच का वर्णन भी आता है। भगवती सरस्वती के इस अद्भुत विश्वविजय कवच को धारण करके ही व्यास, ऋषिश्रृंग, भारद्धाज, देवल और जैगीषव्य आदि ऋषियों ने सिद्धी पायी थी। सरस्वती की काली के रूप में उपासना करने से काली दास ने ख्याति पायी थी। गोस्वामी जी कहते है कि गंगा और सरस्वती दोनों एक ही समान पवित्र है। एक पाप हारणी है तथा दूसरी अविवेक हारणी है।
भारतीय पंचाग में छ: ऋतुएं होती है। बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। बसंत पंचमी फूलों के खिलने तथा नये फसलों के आने का त्यौहार है। बसंत पंचमी के दिन को बच्चों की शिक्षा दीक्षा के लिए शुभ मानते हैं। यह भी मान्यता है ​​कि इस दिन बच्चों की जीभ में शहद से ऊॅं बनाना चाहिए। जिससे बच्चा ज्ञानवान होता है। बच्चों के अन्नप्राशन के लिए भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है तथा बसंत पंचमी को परिणय सूत्र में बंधने के लिए भी बहुत सौभाग्यशाली माना जाता है एवं गृह प्रवेश तथा नये कार्यों की शुरूआत के लिए बसंत पंचमी का पर्व शुभदायक माना जाता है।
— जगदीश जोशी

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