November 14, 2021

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शरद पूर्णिमा पर विशेष:— इस दिन चांद से बरसता है अमृत

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आश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसी दिन से सर्दियों का आरम्भ माना जाता है। कहते हैं इसी पूर्णिमा को चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ आकाश में होता है ये कलायें हैं— अमृत, मनदा, पुष्य, पुष्टि, तुष्टि, धृति, शाशनी, चन्द्रिका, कान्ति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, बिमला, अंगदा, पूर्व और पूर्णामृत। शरद पूर्णिमा की रात चन्द्रमा से अमृत वर्षा होती है। मान्यता: है कि चन्द्रदेव द्वारा बरसायी जाने वाली चांदनी खीर या दूध को अमृत से भर देती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से भी पता चला है कि दूध में मौजूद लैक्टिक ऐसिड चन्द्रमा की किरणों का अमृत तत्व लेकर शक्ति दायक होता है। चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया और आसान हो जाती है। अमृत रुपी यह खीर श्वास रोगों के लिए दवा का काम करती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण अपनी सोलह कलाओं के साथ अपने पूर्णावतार में महारास रचाते हैं। श्रीकृष्ण की इन्हीं कलाओं से गोपियां निधिवन की ओर खींची चली आयी थी। इस रासलीला में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। केवल श्री कृष्ण ही अकेले पुरुष इस रासलीला में मौजूद थे। वह भी गोपी कृष्ण के रुप में। इस लीला को देखने के लिए देवता भी लालायित थे भगवान महादेव के मन में इस लीला को देखने की इतनी प्रबल इच्छा हुयी कि वह अपने को नहीं रोक पाये और गोपी का रुप धारण कर वृंदावन पहुंच गये और रासलीला में शामिल हो गये। तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें पहचान लिया और उनके निश्छल प्रेम को देखकर भगवान कृष्ण आन्नदित हो गये और उन्होंने भगवान शिव को गोपेश्वर नाम से पुकार कर उनका स्वागत किया। तभी से शिव का एक नाम गोपेश्वर भी पड़ गया।
माता लक्ष्मी और महर्षि बाल्मीकि का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। माता पार्वती व भगवान शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय का अवतरण भी इसी दिन हुआ। नारद पुराण के अनुसार शरद पूर्णिमा की धवल चांदनी में लक्ष्मी जी पृथ्वी का आनन्द लेने भ्रमण के लिए निकलती है इस दौरान जो मनुष्य जाग कर इस अमृत वेला में उनकी अराधना करता है। उसे वह अनुग्रहीत करती है एक अन्य कथा के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात को नि:संतान महिलायें संतान की कामना के लिए कोजागरी (कौन जाग रहा) व्रत रखती है। इस व्रत से माता लक्ष्मी सभी की मनोकामना पूर्ण करती है। इसीलिये इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। उल्लेख मिलता है कि प्राचीन काल में शरद पूर्णिमा की रात वैद्यो द्वारा जड़ी—बूटियों से औषधियां बनायी जाती थी शरद पूर्णिमा की रात चन्द्र किरणें अन्न व वनस्पति में औषधीय गुण सींचती है।
शरद पूर्णिमा के दिन श्रीसूक्त व लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना चाहिए तथा यज्ञादि में खीर की आहूति देनी चाहिए। शरद पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा व रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। कुमाऊं में इस दिन आकाश दीप जलाने की भी परम्परा है। — जगदीश जोशी

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